वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

देवदास उपन्यास (शरत चंद्र)




शरद बाबू के उपन्यासों में जिस रचना को सब से अधिक लोकप्रियता मिली है वह है देवदास। तालसोनापुर गाँव के देवदास और पार्वती बालपन से अभिन्न स्नेह सूत्रों में बँध जाते हैं, किन्तु देवदास की भीरू प्रवृत्ति और उसके माता-पिता के मिथ्या कुलाभिमान के कारण दोनों का विवाह नहीं हो पाता।

1917 में लिखा गया यह देवदास  उपन्यास शरत चंद्र की कलम से निकला हुआ एक महान उपन्यास है । प्रेम और त्याग की भावना के प्रतीक इस उपन्यास की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस उपन्यास पर अब तक तीन फिल्में बन चुकी है।


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कापालिक - कहानी (इलाचंद्र जोशी)



कापालिक इलाचंद्र जोशी की एक बेहतरीन कहानी है। यह कहानी एक अघोरी के संस्मरणों पर आधारित है. 

हिंदी कथा साहित्य में मुंशी प्रेमचंद के बाद की पीढ़ी में जैनेंद्र और अज्ञेय के साथ इलाचंद्र जोशी का कथा साहित्य, विषय वस्तु और कलात्मक ऊंचाई में हमारा ध्यान सबसे अधिक खींचता है। बारह उपन्यास, आठ कहानी संग्रह, आठ समालोचना तथा निबंध संग्रह, एक कविता संग्रह सहित विविध विषयों पर छह अन्य मूल्यवान कृतियां जोशी जी ने हिंदी साहित्य को प्रदान की है।


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आनंदमठ - उपन्यास (बंकिम चंद्र)


सन १८८२ में प्रकाशित बंकिम चंद्र चटोपाध्याय द्वारा लिखित यह उपन्यास भारतीय इतिहास के उन दुर्लभ दस्तावेजोंमें से एक है जिन्होंने समाज को एक नई दिशा देने का काम किया। इस उपन्यास को सन्यासी आन्दोलन और बंगाल अकाल की छाया में लिखा गया है।

आनन्द मठ बांग्ला भाषा का एक उपन्यास है जिसकी रचना बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने १८८२ में की थी। इस कृति का भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम और स्वतन्त्रता के क्रान्तिकारियों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। भारत का राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम् इसी उपन्यास से लिया गया है। आनंदमठ राजनीतिक उपन्यास है। इस उपन्यास में उत्तर बंगाल में 1773 के संन्यासी विद्रोह का वर्णन किया गया है। इस पुस्तक में देशभक्ति की भावना है।

यह पुस्तक हर भारतीय को जरूर पढ़नी चाहिए ।


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श्री साईं चरित्र


साईं बाबा (२८ सितंबर, १८३५– १५ अक्तूबर, १९१८), एक भारतीय संत एवं गुरू हैं जिनका जीवन शिरडी में बीता। उन्होंने लोक कल्याणकारी कार्यों को किया तथा जनता में भक्ति एवं धर्म की धारा बहाई। इनके अनुयायी भारत के सभी प्रांतों में हैं एवं इनकी मृत्यु के लगभग 95 वर्षों के बाद आज भी इनके चमत्कारों को सुना जाता है।

सांई बाबा की शिक्षा:

१. !! सबका मालिक एक!!
साई बाबा की सबसे बडी शिक्षा और सन्देश है कि जाति, धर्म्, समुदाय, आदि व्यर्थ की बातो मे ना पड कर आपसी मतभेद भुलाकर आपस मे प्रेम और सदभावाना से रहना चाहिए क्योकि सबका मलिक एक है ।
२ !!श्रद्धा और सबूरी!!
साई बाबा ने अपने जीवन मे यह सन्देश दिया है कि हमेशा श्रद्धा और विश्वास के साथ जीवन यापन करते हुए सबूरी (सब्र)के साथ जीवन व्यतीत करे !
३.!!मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है!!
साई बाबा ने कभी भी किसी को धर्म की अवहेलना नही की अपितु सभी धर्मों का सम्मान करने की सलाह देते हुए हमेशा मनवता को ही सबसे बडा धर्म और कर्म बताते हुए जीवन जीने की अमूल्य शिक्षा प्रदान की है!
४.!!जातिगत भेद भुला कर प्रेम पूर्वक रहना!!
साई बाबा ने कहा है की जाति,समाज,भेद-भाव,आदि सब बाते ईश्वर ने नही बल्कि इंसानों द्वारा बनाया गया है! इसलिए ईश्वर की नजर मे न तो कोई उच्च है और न ही कोई निम्न इसलिए जो काम ईश्वर को भी पसद नही है वह मनुष्य को तो करना ही नही चाहिए अर्थात जात-पात,धर्म,समाज आदि मिथ्या बातों में न पड़ कर आपस मे प्रेमपूर्वक रहकर जीवन व्यतीत करना चाहिए!
५.!!गरीबो और लाचार की मदद करना सबसे बड़ी पूजा है!!
साई बाबा ने हमेसा ही सभी जनमानस से यही बार-बार कहा है कि सभी के साथ ही समानता का व्यवहार करना चाहिए! गरीबों और लाचारों की यथासम्भव मदद करना चाहिए और यही सबसे बडी पूजा है! क्योकि जो गरीबों, लाचारों की मदद करता है ईश्वर उसकी मदद करता है!
६.!!माता-पिता, बुजुर्गो, गुरुजनों, बडो का सम्मान करना चाहिए!!


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पृष्ठ संख्या : 185

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प्रेमचंद के फटे जूते (हरिशंकर परसाई )



'प्रेमचंद के फटे जूते' - हरिशंकर परसाई की एक व्यंग्य रचना है जो पाठकों के मन को गुदगुदाती है और दिखावे की संस्कृति और अवसरवादिता पर चोट करती है।

हरिशंकर परसाई
(२२ अगस्त, १९२२ - १० अगस्त, १९९५) हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और व्यंग्यकार थे। उनका जन्म जमानी, होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ था। वे हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्केफुल्के मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा

उनकी व्यंग्य रचनाएँ हमारे मन में गुदगुदी ही पैदा नहीं करतीं बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने–सामने खड़ा करती है, जिनसे किसी भी व्यक्ति का अलग रह पाना लगभग असंभव है। लगातार खोखली होती जा रही हमारी सामाजिक और राजनॅतिक व्यवस्था में पिसते मध्यमवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है। सामाजिक पाखंड और रूढ़िवादी जीवन–मूल्यों की खिल्ली उड़ाते हुए उन्होंने सदैव विवेक और विज्ञान–सम्मत दृष्टि को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भाषाशैली में खास किस्म का अपनापा है, जिससे पाठक यह महसूस करता है कि लेखक उसके सामने ही बैठा है



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