वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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मंगलवार, 26 नवंबर 2013

आचार्य विनोबा भावे


'भूदान आन्दोलन' के द्वारा भारतीय समाज की दशा और दिशा बदल देने वाले आचार्य विनोबा भावे के बारे में यह पुस्तक हमें बहुत सी जानकारियां देती है।

आचार्य विनोबा भावे
(11 सितेम्बर, 1895 - 15 नवंबर, 1982) के जन्म का नाम विनायक नरहरी भावे था। उनका जन्म गागोडे, महाराष्ट्र मे हुआ था। उन्हे भारत का राष्ट्रीय आध्यापक और महात्मा गांधी का आध्यातमिक उत्तराधीकारी समझा जाता है। उन्होने अपने जीवन के आखरी वर्ष पुनार, महाराष्ट्र के आश्रम मे गुजारे। इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल को अनुशासन पर्व कहने के कारण वे वि्वाद मे भी थे।

फाइल का आकार: 7 Mb


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गुरुवार, 21 नवंबर 2013

रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा




रामप्रसाद बिस्मिल भारत के महान सपूत थे जिन्होने भारत की आजादी के लिये अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनका जन्म सन १८९७ में उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में हुआ था। १९ दिसम्बर, सन १९२७ को ब्रिटिश शासन ने उनको गोरखपुर जेल में फांसी पर चढा दिया।

रामप्रसाद बिस्मिल ने यह आत्म-कथा अपनी फांसी से दो दिन पहले ही समाप्त की थी

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वन्दे मातरम् के बाद अमर शहीद रामप्रसाद 'बिस्मिल' का 'सरफरोशी की तमन्ना' ही वह गीत है जिसे गाते हुए कितने ही देशभक्त फांसी के फन्दे को चूम लिये।
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वन्दे मातरम् के बाद अमर शहीद रामप्रसाद 'बिस्मिल' का सरफरोशी की तमन्ना  ही वह गीत है जिसे गाते हुए कितने ही देशभक्त फांसी के फन्दे को चूम लिये।

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है
 

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है


करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है

रहबरे राहे मुहब्बत, रह न जाना राह में
लज्जते-सेहरा न वर्दी दूरिए-मंजिल में है

अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़
एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है ।

ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूचा-ए-कातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

है लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर,
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर,
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिन में हो जुनून कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से,
और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बाँधकर सर पे कफ़न,
जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम.
जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

यूँ खड़ा मकतल में कातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें कोई रोको ना आज
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून
तूफ़ानों से क्या लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है


- बिस्मिल आजिमाबादी

फाइल का आकार:
5 Mb


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मंगलवार, 19 नवंबर 2013

निशा निमंत्रण - हरिवंशराय बच्चन


निशा निमंत्रण हरिवंशराय बच्चन के गीतों का संकलन है जिसका प्रकाशन १९३८ ई० में हुआ। ये गीत १३-१३ पंक्तियों के हैं जो कि हिन्दी साहित्य की श्रेष्ठतम उपलब्धियों में से हें।

ये गीत शैली और गठन की दृष्टि से अतुलनीय है। नितान्त एकाकीपन की स्थिति में लिखी गईं ये त्रयोदशपदियाँ अनुभूति की दृष्टि से वैसी ही सघन हैं जैसी भाषा शिल्प की दृष्टि से परिष्कृत। संकलन के सभी गीत स्वतंत्र हैं फिर भी प्रत्येक की रचना का गठन एक मूल भाव से अनुशासित है। पहला गीत "दिन जल्दी जल्दी ढलता है" से प्रारम्भ होकर "निशा निमंत्रण" रात्रि की निस्तब्धता के बड़े सघन चित्र करता हुआ प्रातःकालीन प्रकअश में समाप्त होता है। प्रत्येक दृष्टि से निशा निमंत्रण के गीत उच्चकोटि के हैं और बच्चन का कवि अपने चरम पर पहुँच गया प्रतीत होता है।

फाइल का आकार: 3 Mb

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रविवार, 3 नवंबर 2013

लेन -देन (शरत चन्द्)


लेन -देन  शरत चन्द्र का एक बेहतरीन उपन्यास है। यह पाठकों का भरपूर मनोरंजन करता है ।

शरत चन्द्र हिंदी के जाने-माने उपन्यासकार रहे है। इनके 'देवदास' उपन्यास पर कई फिल्में भी बन चुकी है।

शरत के उपन्यासों के कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुए हैं। कहा जाता है कि उनके पुरुष पात्रों से उनकी नायिकाएँ अधिक बलिष्ठ हैं। शरत्चंद्र की जनप्रियता उनकी कलात्मक रचना और नपे तुले शब्दों या जीवन से ओतप्रोत घटनावलियों के कारण नहीं है बल्कि उनके उपन्यासों में नारी जिस प्रकार परंपरागत बंधनों से छटपटाती दृष्टिगोचर होती है, जिस प्रकार पुरुष और स्त्री के संबंधों को एक नए आधार पर स्थापित करने के लिए पक्ष प्रस्तुत किया गया है, उसी से शरत् को जनप्रियता मिली।

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


चण्डीगढ़ की चण्डीजी बहुत प्राचीन देवी हैं।
कहते हैं कि राजा वीरबाहु के किसी पूर्व पुरुष ने किसी युद्ध में विजयी होकर बरुई नदी के तट पर इस मन्दिर की स्थापना की थी और बाद में केवल इसी के आश्रय से धीर-धीरे वह चण्डीगढ़ तैयार हो गया। शायद किसी दिन वास्तव में ही यह गांव देवोत्तर सम्पत्ति में ही गिना जाता था, किन्तु अब तो मन्दिर से सटी हुई केवल कुछ ही बीघे जमीन छोड़कर बाकी सारी मनुष्यों ने छीन ली है। इन दिनों यह गांव बीजगांव की जमींदारी में शामिल है। किस प्रकार और किस दुर्जेय रहस्यपूर्ण उपाय से अनाथ और असक्त की सम्पत्ति अर्थात् असहाय देवता का धन अन्त में जमींदार के उदर में आकर सुस्थिर बन गया, उसकी कहानी साधारण पाठकों के लिए निष्प्रयोजन है। मेरा वक्तव्य केवल यही है कि चण्डीगढ़ का अधिकांश भाग अब चण्डीगढ़ के हाथ से निकल चुका है। हो सकता है कि देवता का इससे कुछ भी नहीं बनता-बिगड़ता किन्तु जो लोग उनके सेवा-स्वत्वाधिकारी हैं उनके मन में क्षोभ आज तक भी दूर नहीं हुआ है; इसीलिए अब भी झगड़े-बखेड़े उठते ही रहते हैं और कभी तो बहुत ही उग्र रूप धारण कर लेते हैं।

बीज गांव के जमींदार वंश के लोग अत्याचारी समझे जाने से सदा से ही बदनाम हैं। किन्तु दो-एक ही साल पहले पुत्रहीन जमींदार की मृत्यु हो जाने से जिस दिन उनके भानजे जीवननन्द चौधरी को बादशाही मिल गई है, उसी दिन से छोटे-बड़े सभी प्रजाजनों का जीवन कष्टमय हो गया है। इस प्रकार की जनश्रुति प्रचलित हो चुकी है कि भूतपूर्व जमींदार कालीमोहन बाबू ने इस मनुष्य की उच्छृंखलता सहन न करने के कारण इसे त्याग करने का निश्चय कर लिया था, किन्तु अकस्मात मृत्यु हो जाने से उनकी उस इच्छा की पूर्ति न हो सकी।

वे ही जीवननन्द चौधरी आजकल इलाका देखने के बहाने चचण्डीगढ़ गांव में आकर उपस्थित हुए हैं।
इस गांव में सदा के ही एक मामूली अदालत ‘कचहरी बाड़ी’ के नाम से मौजूद है, किन्तु जिले के ऊबड़-खाबड़ पहाड़ से सटे हुए इस गांव के स्वास्थ्यकर जलवायु और विशेषकर बालू से भरी बरुई नदी का जल अत्यन्त रुचिकर समझकर इसी जीवनन्द के ही नाना राधामोहन बाबू ने गांव के छोर पर ‘शान्ति निकुंज’ नामक एक बंगला बनावाया था।
वे प्रायः ही बीच-बीच में आकर इसी में ठहरते थे। किन्तु उनके पुत्र कालीमोहन ने किसी दिन भी यहाँ पदार्पण नहीं किया। इस कारण किसी समय जिस गृह में सौन्दर्य था, ऐश्वर्य था, मर्यादा थी—चारों ओर का जो बगीचा दिन-रात सुन्दर फूल-फूलों से भरा रहता था, वही फिर किसी दिन दूसरे के हाथ में पड़ लापरवाही के कारण जीर्ण, मलिन और निकम्मे पौधों से भर उठा। यहां माली नहीं था। केवल बरुई के सूखे तट पर एक विशाल टूटा-फूटा मकान जंगल के मध्य में खड़ा रहकर अपमानित गौरव की भांति दिन-रात शून्य स्थल में उदासी फैला रहा था। कितने दिनों से यहां किसी ने प्रवेश नहीं किया, कितने दिनों से यहाँ की कचहरी का प्रधान कर्मचारी सदर मुकाम की झूठी कैफियतें भेजता आया है, इन सब का हिसाब लगाने वाला कोई नहीं है।

 फाइल का आकार: 24  Mb


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बुधवार, 2 अक्तूबर 2013

सम्राट चन्द्रगुप्त





चन्द्रगुप्त मौर्य (जन्म 340BC, राज 322-298 BC) में भारत में सम्राट थे। इनको कभी कभी चन्द्रगुप्त नाम से भी संबोधित किया जाता है। इन्होंने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की थी। चन्द्रगुप्त पूरे भारत को एक साम्राज्य के अधीन लाने में सफ़ल रहे।

चन्द्रगुप्त मौर्य के विशाल साम्राज्य में काबुल, हेरात, कन्धार, बलूचिस्तान, पंजाब, गंगा-यमुना का मैदान, बिहार, बंगाल, गुजरात था तथा विन्ध्य और कश्मीर के भू-भाग सम्मिलित थे

मौर्य राजवंश (३२२-१८५ ईसापूर्व) प्राचीन भारत का एक राजवंश था । इसने १३७ वर्ष भारत में राज्य किया । इसकी स्थापना का श्रेय चन्द्रगुप्त मौर्य और उसके मन्त्री कौटिल्य को दिया जाता है, जिन्होंने नन्द वंश के सम्राट घनानन्द को पराजित किया।

चन्द्रगुप्त मौर्य के जन्म वंश के सम्बन्ध में विवाद है । ब्राह्मण, बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों में परस्पर विरोधी विवरण मिलता है ।
विविध प्रमाणों और आलोचनात्मक समीक्षा के बाद यह तर्क निर्धारित होता है कि चन्द्रगुप्त मोरिय वंश का क्षत्रिय था । चन्द्रगुप्त के पिता मोरिय नगर प्रमुख थे । जब वह गर्भ में ही था तब उसके पिता की मृत्यु युद्धभूमि में हो गयी थी । उसका पाटलिपुत्र में जन्म हुआ था तथा एक गोपालक द्वारा पोषित किया गया था । चरावाह तथा शिकारी रूप में ही राजा-गुण होने का पता चाणक्य ने कर लिया था तथा उसे एक हजार में कषार्पण में खरीद लिया । तत्पश्चा्त्‌ तक्षशिला लाकर सभी विद्या में निपुण बनाया । अध्ययन के दौरान ही सम्भवतः चन्द्रगुप्त सिकन्दर से मिला था । ३२३ ई. पू. में सिकन्दर की मृत्यु हो गयी तथा उत्तरी सिन्धु घाटी में प्रमुख यूनानी क्षत्रप फिलिप द्वितीय की हत्या हो गई ।
जिस समय चन्द्रगुप्त राजा बना था भारत की राजनीतिक स्थिति बहुत खराब थी । उसने सबसे पहले एक सेना तैयार की और सिकन्दर के विरुद्ध युद्ध प्रारम्भ किया । ३१७ ई. पू. तक उसने सम्पूर्ण सिन्ध और पंजाब प्रदेशों पर अधिकार कर लिया । अब चन्द्रगुप्त मौर्य सिन्ध तथा पंजाब का एकक्षत्र शासक हो गया । पंजाब और सिन्ध विजय के बाद चन्द्रगुप्त तथा चाणक्य ने धनानन्द का नाश करने हेतु मगध पर आक्रमण कर दिया । युद्ध में धनाननन्द मारा गया अब चन्द्रगुप्त भारत के एक विशाल साम्राज्य मगध का शासक बन गया । सिकन्दर की मृत्यु के बाद सेल्यूकस उसका उत्तराधिकारी बना । वह सिकन्दर द्वारा जीता हुआ भू-भाग प्राप्त करने के लिए उत्सुक था । इस उद्देश्य से ३०५ ई. पू. उसने भारत पर पुनः चढ़ाई की । चन्द्रगुप्त ने पश्चिामोत्तर भारत के यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को पराजित कर एरिया (हेरात), अराकोसिया (कंधार), जेड्रोसिया पेरोपेनिसडाई (काबुल) के भू-भाग को अधिकृत कर विशाल भारतीय साम्राज्य की स्थापना की । सेल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलन का विवाह चन्द्रगुप्त से कर दिया । उसने मेगस्थनीज को राजदूत के रूप में चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में नियुक्तम किया ।



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गुरुवार, 12 सितंबर 2013

'एक कहानी यह भी' - मन्नू भंडारी



मन्नू भंडारी हिंदी की जानी मानी कहानीकार हैं । 'एक कहानी यह भी' उनकी आत्मकथा नहीं है बल्कि इसमें उन्होंने अपने जीवन से जुड़े व्यक्तियों और घटनाओं के बारे में लिखा है।

मन्नू भंडारी ने कहानियां और उपन्यास दोनों लिखे हैं। 'एक प्लेट सैलाब' (१९६२), `मैं हार गई' (१९५७), `तीन निगाहों की एक तस्वीर', `यही सच है'(१९६६), `त्रिशंकु' और `आंखों देखा झूठ' उनके महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह हैं। विवाह विच्छेद की त्रासदी में पिस रहे एक बच्चे को केंद्र में रखकर लिखा गया उनका उपन्यास `आपका बंटी' (१९७१) हिन्दी के सफलतम उपन्यासों में गिना जाता है।

नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार के बीच आम आदमी की पीड़ा और दर्द की गहराई को उद्घाटित करने वाले उनके उपन्यास `महाभोज' (१९७९) पर आधारित नाटक अत्यधिक लोकप्रिय हुआ था। इसी प्रकार 'यही सच है' पर आधारित 'रजनीगंधा' नामक फिल्म अत्यंत लोकप्रिय हुई थी और उसको १९७४ की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था।


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मंगलवार, 3 सितंबर 2013

हिंदी शोर्टहैण्ड मैनुअल


'हिंदी शोर्टहैण्ड मैनुअल' (Hindi Shorthand Manual) पढ़कर आप भी घर बैठे शोर्टहैण्ड सीख सकते है।

शोर्टहैण्ड (Shorthand)
लिखने की एक सांकेतिक प्रणाली है जो की लिखने की गति को बढाती है. इसके जरिये हम काफी तेज गति से लिख सकते है या नोट्स ले सकते है ।
शोर्टहैण्ड लिखने की कई पद्धतियां है लेकिन सर इसाक पिट्मन ( Sir Isaac Pitman ) की पद्धति सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। यह पुस्तक इसी पद्धति पर आधारित है।

इसे
हमारे पास दिल्ली से श्री अमित प्रकाश ने भेजा है

अवश्य पढ़ें।

 

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गोली (सआदत हसन मंटो)



'गोली' सआदत हसन मंटो की एक चर्चित कहानी है जिसमे इंसान के दोहरे चरित्र को उजागर किया गया है।

मंटो का जन्म 11 मई 1912 को अमृतसर के एक पुश्तैनी बेरिस्टर परिवार में हुआ था.

सआदत हसन के क्राँतिकारी दिमाग़ और अतिसंवेदनशील हृदय ने उसे मंटो बना दिया और तब जलियाँवाला बाग़ की घटना से निकल कर कहानी 'तमाशा' आई. यह मंटो की पहली कहानी थी. धीरे-धीरे मंटो का रूझान रूसी साहित्य की ओर बढ़ने लगा. जिसका प्रभाव हमें उनके रचनाकर्म में दिखाई देता है.

1948 के बाद मंटो पाकिस्तान चले गए. जहाँ उनके 14 कहानी संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें 161 कहानियाँ संग्रहित हैं.
इन कहानियों में 'सियाह हाशिए', 'नंगी आवाज़ें', 'लाइसेंस', 'खोल दो', 'टेटवाल का कुत्ता', 'मम्मी', 'टोबा टेक सिंह,' 'फुंदने', 'बिजली पहलवान', 'बू', 'ठंडा गोश्त', 'काली शलवार' और 'हतक' जैसी तमाम चर्चित कहानियाँ शामिल हैं.
जिनमें कहानी 'बू', 'काली शलवार','ऊपर-नीचे', 'दरमियाँ', 'ठंडा गोश्त', 'धुआँ' पर लंबे मुकदमे चले. हालाँकि इन मुकदमों से मंटो मानसिक रूप से परेशान ज़रूर हुए लेकिन उनके तेवर ज्यों के त्यों थे.

मंटो सिर्फ़ 42 साल जिए, लेकिन उनके 19 साल के साहित्यिक जीवन से हमें 230 कहानियाँ, 67 रेडियो नाटक, 22 शब्द चित्र और 70 लेख मिले.
तमाम ज़िल्लतें और परेशानियाँ उठाने के बाद, 18 जनवरी 1955 में मंटो ने अपने उन्हीं तेवरों के साथ, इस दुनिया को अलविदा कह दिया.


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शनिवार, 24 अगस्त 2013

चन्द्रकान्ता संतति (भाग 6 व अंतिम)





चंद्रकांता संतति लोक विश्रुत साहित्यकार बाबू देवकीनंदन खत्री का विश्वप्रसिद्ध ऐय्यारी उपन्यास है.

चन्द्रकान्ता संतति हिन्दी साहित्य का ऐसा उपन्यास है जिसने पूरे देश में तहलका मचाया था। बाबू देवकीनन्दन खत्री ने पहले चन्द्रकान्ता लिखा, फिर चन्द्रकान्ता की लोकप्रियता और सफलता को देख कर उन्होंने चन्द्रकान्ता की कहानी को आगे बढ़ाया और चन्द्रकान्ता संतति की रचना की। हिन्दी के प्रचार प्रसार में यह उपन्यास मील का पत्थर है। कहते हैं कि लाखों लोगों ने चन्द्रकान्ता संतति को पढ़ने के लिए ही हिन्दी सीखी। घटना प्रधान, तिलिस्म, जादूगरी, रहस्यलोक, एय्यारी की पृष्ठभूमि वाला हिन्दी का यह उपन्यास आज भी लोकप्रियता के शीर्ष पर है।  

भाग 1 डाउनलोड करने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
भाग 2 डाउनलोड करने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
भाग 3 डाउनलोड करने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
भाग 4 डाउनलोड करने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
भाग 5 डाउनलोड करने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें

 यह पुस्तक हमें मेरठ, उत्तरप्रदेश से श्री प्रमोद कुमार बिश्नोई ने भेजी है . इसके लिए हम उनके बहुत आभारी है.

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गुरुवार, 8 अगस्त 2013

चन्द्रकान्ता संतति (भाग 5)





चंद्रकांता संतति लोक विश्रुत साहित्यकार बाबू देवकीनंदन खत्री का विश्वप्रसिद्ध ऐय्यारी उपन्यास है.

चन्द्रकान्ता संतति हिन्दी साहित्य का ऐसा उपन्यास है जिसने पूरे देश में तहलका मचाया था। बाबू देवकीनन्दन खत्री ने पहले चन्द्रकान्ता लिखा, फिर चन्द्रकान्ता की लोकप्रियता और सफलता को देख कर उन्होंने चन्द्रकान्ता की कहानी को आगे बढ़ाया और चन्द्रकान्ता संतति की रचना की। हिन्दी के प्रचार प्रसार में यह उपन्यास मील का पत्थर है। कहते हैं कि लाखों लोगों ने चन्द्रकान्ता संतति को पढ़ने के लिए ही हिन्दी सीखी। घटना प्रधान, तिलिस्म, जादूगरी, रहस्यलोक, एय्यारी की पृष्ठभूमि वाला हिन्दी का यह उपन्यास आज भी लोकप्रियता के शीर्ष पर है।  

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मंगलवार, 30 जुलाई 2013

चन्द्रकान्ता संतति ( भाग 4)





चंद्रकांता संतति लोक विश्रुत साहित्यकार बाबू देवकीनंदन खत्री का विश्वप्रसिद्ध ऐय्यारी उपन्यास है.

चन्द्रकान्ता संतति हिन्दी साहित्य का ऐसा उपन्यास है जिसने पूरे देश में तहलका मचाया था। बाबू देवकीनन्दन खत्री ने पहले चन्द्रकान्ता लिखा, फिर चन्द्रकान्ता की लोकप्रियता और सफलता को देख कर उन्होंने चन्द्रकान्ता की कहानी को आगे बढ़ाया और चन्द्रकान्ता संतति की रचना की। हिन्दी के प्रचार प्रसार में यह उपन्यास मील का पत्थर है। कहते हैं कि लाखों लोगों ने चन्द्रकान्ता संतति को पढ़ने के लिए ही हिन्दी सीखी। घटना प्रधान, तिलिस्म, जादूगरी, रहस्यलोक, एय्यारी की पृष्ठभूमि वाला हिन्दी का यह उपन्यास आज भी लोकप्रियता के शीर्ष पर है।  

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गुरुवार, 25 जुलाई 2013

चन्द्रकान्ता संतति ( भाग 3)





चंद्रकांता संतति लोक विश्रुत साहित्यकार बाबू देवकीनंदन खत्री का विश्वप्रसिद्ध ऐय्यारी उपन्यास है.

चन्द्रकान्ता संतति हिन्दी साहित्य का ऐसा उपन्यास है जिसने पूरे देश में तहलका मचाया था। बाबू देवकीनन्दन खत्री ने पहले चन्द्रकान्ता लिखा, फिर चन्द्रकान्ता की लोकप्रियता और सफलता को देख कर उन्होंने चन्द्रकान्ता की कहानी को आगे बढ़ाया और चन्द्रकान्ता संतति की रचना की। हिन्दी के प्रचार प्रसार में यह उपन्यास मील का पत्थर है। कहते हैं कि लाखों लोगों ने चन्द्रकान्ता संतति को पढ़ने के लिए ही हिन्दी सीखी। घटना प्रधान, तिलिस्म, जादूगरी, रहस्यलोक, एय्यारी की पृष्ठभूमि वाला हिन्दी का यह उपन्यास आज भी लोकप्रियता के शीर्ष पर है।  

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गुरुवार, 18 जुलाई 2013

चन्द्रकान्ता संतति ( भाग 2)





चंद्रकांता संतति लोक विश्रुत साहित्यकार बाबू देवकीनंदन खत्री का विश्वप्रसिद्ध ऐय्यारी उपन्यास है.

चन्द्रकान्ता संतति हिन्दी साहित्य का ऐसा उपन्यास है जिसने पूरे देश में तहलका मचाया था। बाबू देवकीनन्दन खत्री ने पहले चन्द्रकान्ता लिखा, फिर चन्द्रकान्ता की लोकप्रियता और सफलता को देख कर उन्होंने चन्द्रकान्ता की कहानी को आगे बढ़ाया और चन्द्रकान्ता संतति की रचना की। हिन्दी के प्रचार प्रसार में यह उपन्यास मील का पत्थर है। कहते हैं कि लाखों लोगों ने चन्द्रकान्ता संतति को पढ़ने के लिए ही हिन्दी सीखी। घटना प्रधान, तिलिस्म, जादूगरी, रहस्यलोक, एय्यारी की पृष्ठभूमि वाला हिन्दी का यह उपन्यास आज भी लोकप्रियता के शीर्ष पर है।  

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बुधवार, 10 जुलाई 2013

चन्द्रकान्ता संतति ( भाग 1)





चंद्रकांता संतति लोक विश्रुत साहित्यकार बाबू देवकीनंदन खत्री का विश्वप्रसिद्ध ऐय्यारी उपन्यास है.

चन्द्रकान्ता संतति हिन्दी साहित्य का ऐसा उपन्यास है जिसने पूरे देश में तहलका मचाया था। बाबू देवकीनन्दन खत्री ने पहले चन्द्रकान्ता लिखा, फिर चन्द्रकान्ता की लोकप्रियता और सफलता को देख कर उन्होंने चन्द्रकान्ता की कहानी को आगे बढ़ाया और चन्द्रकान्ता संतति की रचना की। हिन्दी के प्रचार प्रसार में यह उपन्यास मील का पत्थर है। कहते हैं कि लाखों लोगों ने चन्द्रकान्ता संतति को पढ़ने के लिए ही हिन्दी सीखी। घटना प्रधान, तिलिस्म, जादूगरी, रहस्यलोक, एय्यारी की पृष्ठभूमि वाला हिन्दी का यह उपन्यास आज भी लोकप्रियता के शीर्ष पर है।  

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शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

महात्मा शेख सादी




प्रस्तुत पुस्तक शेख सादी की जीवनी है। इसे प्रेमचंद जी ने लिखा है।
रचनाकार – शेख़ सादी – बारहवीं शती के महान संत और विचारक थे । मूल पर्शियन भाषा में कही गई शेख़ सादी की शिक्षाप्रद कहानियाँ सदियों से सारे जग का प्रेरणा-स्रोत बनी रही हैं।

गुलिस्ताँ तथा बोस्ताँ के प्रणेता शेख सादी है । इनकी लेखन शैली अत्यंत सुगम तथा आकर्षक है। गुलिस्ताँ गद्य में और बोस्ताँ पद्य में है। गुलिस्ताँ के सिवा गद्य में इनकी अन्य रचनाएँ भी हैं और पद्य में बोस्ताँ के सिवा इनका दीवान भी है, जिसमें कसीदे, गजलें तथा अन्य प्रकार की कविताओं के नमूने भी हैं। शेख सादी की गणना अच्छे गजल कहनेवाले कवियों में की जाती है।





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बुधवार, 19 जून 2013

मनुस्मृति




'अपनी हिंदी' के पाठकों के लिए प्रस्तुत है - विश्व प्रसिद्ध पुस्तक 'मनु स्मृति' यह पुस्तक संस्कृत में है और साथ में हिंदी अनुवाद दिया गया है

मनुस्मृति सबसे प्राचीन और प्रमाणित मानी गयी है, जिसकी रचना शुंग काल में हुई थी । यह ग्रन्थ शुंगकालीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक दशा का बोध कराता है।
इसके इतने संस्करण प्रकाशित हुए कि उनका नाम देना सम्भव नहीं है। इस ग्रंथ में निर्णयसागर के संस्करण एवं कुल्लूकभट्ट की टीका का उपयोग हुआ है। मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद कई बार हो चुका है।

भारतीय पंरपरा में मनुस्मृति को (जो मानव-धर्म-शास्त्र, मनुसंहिता आदि नामों से प्रसिद्ध है) प्राचीनतम स्मृति एवं प्रमाणभूत शास्त्र के रूप में मान्यता प्राप्त है। धर्मशास्त्रीय ग्रंथकारों के अतिरिक्त शंकराचार्य, शबरस्वामी जैसे दार्शनिक भी प्रमाणरूपेण इस ग्रंथ को उद्धृत करते हैं।

परंपरानुसार यह स्मृति स्वायंभुव मनु द्वारा रचित है, वैवस्वत मनु या प्राचनेस मनु द्वारा नहीं। मनुस्मृति से यह भी पता चलता है कि स्वायंभुव मनु के मूलशास्त्र का आश्रय कर भृगु ने उस स्मृति का उपवृंहण किया था, जो प्रचलित मनुस्मृति के नाम से प्रसिद्ध है। इस भार्गवीया मनुस्मृति की तरह नारदीया मनुस्मृति भी प्रचलित है।


मनुस्मृति’ वह धर्मशास्त्र है जिसकी मान्यता जगविख्यात है। न केवल देश में अपितु विदेश में भी इसके प्रमाणों के आधार पर निर्णय होते रहे हैं और आज भी होते हैं। अतः धर्मशास्त्र के रूप में मनुस्मृति को विश्व की अमूल्य निधि माना जाता है। उसके उपरान्त इसके इतने संस्करण प्रकाशित हुए कि उनका नाम देना सम्भव नहीं है। इस ग्रंथ में निर्णयसागर के संस्करण एवं कुल्लूकभट्ट की टीका का उपयोग हुआ है। मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद कई बार हो चुका है।

भारत में वेदों के उपरान्त सर्वाधिक मान्यता और प्रचलन ‘मनुस्मृति’ का ही है। इसमें चारों वर्णों, चारों आश्रमों, सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, भांति-भांति के विवादों, सेना का प्रबन्ध आदि उन सभी विषयों पर परामर्श दिया गया है जो कि मानव मात्र के जीवन में घटित होने सम्भव है यह सब धर्म-व्यवस्था वेद पर आधारित है। मनु महाराज के जीवन और उनके रचनाकाल के विषय में इतिहास-पुराण स्पष्ट नहीं हैं। तथापि सभी एक स्वर से स्वीकार करते हैं कि मनु आदिपुरुष थे और उनका यह शास्त्र आदिःशास्त्र है। क्योंकि मनु की समस्त मान्यताएँ सत्य होने के साथ-साथ देश, काल तथा जाति बन्धनों से रहित है




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मंगलवार, 11 जून 2013

गोदान


गोदान उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास माना जाता है। कुछ लोग इसे प्रेमचंद की सर्वोत्तम कृति भी मानते हैं। इसका प्रकाशन सन १९३६ ई० में हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय बम्बई द्वारा किया गया था। इसमें भारतीय ग्राम समाज एवं परिवेश का सजीव चित्रण किया गया है।


गोदान औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत किसान का महाजनी व्यवस्था में चलने वाले निरंतर शोषण तथा उससे उत्पन्न संत्रास की कथा है। गोदान का नायक होरी एक गरीब किसान है जो किसान वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर मौजूद है। आजीवन दुर्धर्ष संघर्ष के वावजूद उसकी एक अदद गाय की आकांक्षा पूर्ण नहीं हो पाती। गोदान भारतीय कृषक जीवन के संत्रासमय संघर्ष की कहानी है।


यह पुस्तक हमें श्री नावेद हयात ने दिल्ली से भेजी है
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गुरुवार, 23 मई 2013

मंगला (यशपाल )


'मंगला' यशपाल जी की एक प्रसिद्ध कहानी है ।

यशपाल (३ दिसंबर १९०३ - २६ दिसंबर १९७६) का नाम आधुनिक हिन्दी साहित्य के कथाकारों में प्रमुख है। ये एक साथ ही क्रांतिकारी एवं लेखक दोनों रूपों में जाने जाते है। प्रेमचंद के बाद हिन्दी के सुप्रसिद्ध प्रगतिशील कथाकारों में इनका नाम लिया जाता है

अपने विद्यार्थी जीवन से ही यशपाल क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़े, इसके परिणामस्वरुप लम्बी फरारी और जेल में व्यतीत करना पड़ा । इसके बाद इन्होने साहित्य को अपना जीवन बनाया, जो काम कभी इन्होने बंदूक के माध्यम से किया था, अब वही काम इन्होने बुलेटिन के माध्यम से जनजागरण का काम शुरु किया। यश पाल को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन १९७० में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

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