वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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सोमवार, 23 अप्रैल 2012

'गबन' - मुंशी प्रेमचंद




आपने जबसे होश संभाला आप प्रेमचंद को पढ़ते और प्यार करते आये हैं। बचपन से लेकर उम्र ढलने तक प्रेमचंद आपके संग-संग चलता रहा है। निश्चय ही आप से कितनों का ही प्रेमचंद साहित्य से गहरा परिचय भी होगा और मुझे विश्वास है कि प्रेमचंद के जीवन-परिचय की मोटी-मोटी बातें भी आप काफी कुछ जानते होंगे। जैसे कि उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस शहर से चार मील दूर लमही नाम के एक गाँव में हुआ था और पिता मुंशी अजायब लाल एक डाकमुंशी थे। घर पर साधारण खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने की मुंहताजी तो न थी, पर इतना शायद कभी न हो पाया कि उधर से निश्चिंत हुआ जा सके।

'गबन' मुंशी प्रेमचंद का एक प्रसिद्ध उपन्यास है।
अवश्य पढ़ें ।

उपन्यास की एक झलक:

बरसात के दिन हैं, सावन का महीना। आकाश में सुनहरी घटाएँ छायी हुई हैं। रह-रहकर रिमझिम वर्षा होने लगती है। अभी तीसरा पहर है; पर ऐसा मालूम हो रहा है, शाम हो गयी। आमों के बाग में झूला पड़ा है। लड़कियाँ भी झूल रही हैं और उनकी माताएं भी। दो-चार झूल रही हैं, दो-चार झुला रही हैं। कोई कजली गाने लगती है, कोई बारहमासा। इस ऋतु में महिलाओं की बाल-स्मृतियाँ भी जाग उठती हैं। ये फुहारें मानों चिन्ताओं को ह्रदय से धो डालती हैं। मानों मुरझाये हुए मन को भी हरा कर देती हैं। सबके दिल उमगों से भरे हुए हैं। धानी साड़ियों ने प्रकृति की हरियाली से नाता जोड़ा है।

इसी समय एक बिसाती आकर झूले के पास खड़ा हो गया। उसे देखते ही झूला बन्द हो गया। छोटी-बड़ी सबों ने आकर उसे घेर लिया। बिसाती ने अपना सन्दूक खोला और चमकती-दमकती चीजें निकालकर दिखाने लगा। कच्चे मोतियों के गहने थे, कच्चे लैस और गोटे, रंगीन मोजे, खूबसूरत गुड़ियाँ और गुड़ियों के गहने, बच्चों के लट्टू और झुनझुने। किसी ने कोई चीज ली, किसी ने कोई चीज। एक बड़ी-बड़ी आँखोंवाली बालिका ने वह चीज पसन्द की, जो चमकती हुई चीजों में सबसे सुन्दर थी। वह फिरोजी रंग का एक चन्द्रहार था। माँ से बोली-अम्मा, मैं यह हार लूँगी।

माँ ने बिसाती से पूछा-बाबा, यह हार कितने का है ?
बिसाती ने हार को रुमाल से पोंछते हुए कहा-खरीद तो बीस आने की है, मालकिन जो चाहें दे दें।
माता ने कहा-यह तो बड़ा महँगा है। चार दिन में इसकी चमक-दमक जाती रहेगी। बिसाती ने मार्मिक भाव से सिर हिलाकर कहा-बहूजी, चार दिन में तो बिटिया को असली चन्द्रहार मिल जायेगा।
माता के हृदय पर सहृदयता से भरे हुए शब्दों ने चोट की। हार ले लिया गया।
बालिका के आनन्द की सीमा न थी। शायद हीरों के हार से भी उसे इतना आनन्द न होता। उसे पहनकर वह सारे गाँव में नाचती फिरी। उसके पास जो बाल-सम्पत्ति थी, उसमें सबसे मूल्यवान, सबसे प्रिय यही बिल्लौर का हार था।
लड़की का नाम जालपा था, माता का मानकी।


फाइल का आकार:
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3 टिप्पणियां:

Dr. sandhya tiwari on 23/4/12 5:10 pm ने कहा…

hindi ka samman yahi muje mila

Uday on 23/4/12 10:51 pm ने कहा…

vaastavik, apni hindi ne ek tarah se hindi sahitya ki paramparaa ko jeevit rakhne ka sahi prayas kiya hai jo saraahneeya hai..

Suresh kumar on 18/5/12 9:22 pm ने कहा…

Munsi ji ko maine bahut pada hai enki har kahani se koi n koi shiksha jarur milti hai ....

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