वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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बुधवार, 25 अप्रैल 2012

जमशेदजी टाटा की जीवनी




जमशेदजी टाटा (३ मार्च, १८३९ - १९ मई, १९०४) ) वर्तमान में भारत के विश्वप्रसिद्ध औद्योगिक घराने टाटा समूह के संस्थापक थे।

जमशेदजी एक अलग ही व्यक्तित्व के मालिक थे । उन्होंने ना केवल कपड़ा बनाने के नए नए तरीक़े ही अपनाए बल्कि अपने कारखाने में काम करने वाले श्रमिकों का भी खूब ध्यान रखा। उनके भले के लिए जमशेदजी ने अनेक नई व बेहतर श्रम-नीतियाँ अपनाई । इस नज़र से भी वे अपने समय से कहीँ आगे थे । सफलता को कभी केवल अपनी जागीर नही समझा , बल्कि उनके लिए उनकी सफलता उन सब की थी जो उनके लिए काम करते थे। जमशेद जी के अनेक राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी नेताओं से नजदीकी संबंध थे



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'वासंती मेनू' - ओ. हेनरी


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'वासंती मेनू' प्रसिद्ध अमेरिकन लेखक ओ. हेनरी (या विलियम सिडनी पोर्टर) की एक दिल को छू लेने वाली  कहानी है ।


ओ. हेनरी ने सोलह वर्ष की उम्र में घर छोड़ दिया, पर उनकी पढ़ने-लिखने की आतुरता नहीं छूटी। बचपन में उन्होने ग्रीन्सबरो की एक दवाइयों की दुकान में काम किया था, जहां अब तक उसकी जयन्ती मनायी जाती है। उन्नीस वर्ष की अवस्था में वह अपना स्वास्थ्य सुधारने के लिए टेक्सास प्रदेश के गोचरों में रहने चला गया। वहां उसने घुड़सवारी सीख ली और जंगली, अड़ियल घोड़ो को भी वश में करने लगा। फ़िर ऑस्टिन में उसे एक खेती-बाड़ी के दफ़्तर में नौकरी मिल गयी।

आपने आस-पास के चित्रमय जीवन की जिन वस्तुओं का भी उसे परिचय हुआ, वे सब की सब उसकी कहानियों में छन आयीं। यही कारण है कि उसकी कहानियां अधिकतर चरागाहों के प्रदेश, मध्य अमरीका या न्यूयार्क में घटित होती है। शहरी जीवन की कहानियों में जिनके लिए वह प्रसिद्ध है, जीवन की विडम्बनाओं की स्वीक्रति हैं। वे उनके अपने कटु अनुभवों के प्रतिबिम्ब हैं।



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मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

'पुलिस और प्रार्थना' - ओ. हेनरी


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'पुलिस और प्रार्थना' प्रसिद्ध अमेरिकन लेखक ओ. हेनरी (या विलियम सिडनी पोर्टर) की कहानी है । कहानी में नायक सर्दी से बचने के लिए जेल में जाना चाहता है और इसके लिए बार-बार कोशिश करता है लेकिन पुलिस उसे गिरफ्तार ही नहीं कर रही है।


ओ. हेनरी ने सोलह वर्ष की उम्र में घर छोड़ दिया, पर उनकी पढ़ने-लिखने की आतुरता नहीं छूटी। बचपन में उन्होने ग्रीन्सबरो की एक दवाइयों की दुकान में काम किया था, जहां अब तक उसकी जयन्ती मनायी जाती है। उन्नीस वर्ष की अवस्था में वह अपना स्वास्थ्य सुधारने के लिए टेक्सास प्रदेश के गोचरों में रहने चला गया। वहां उसने घुड़सवारी सीख ली और जंगली, अड़ियल घोड़ो को भी वश में करने लगा। फ़िर ऑस्टिन में उसे एक खेती-बाड़ी के दफ़्तर में नौकरी मिल गयी।

आपने आस-पास के चित्रमय जीवन की जिन वस्तुओं का भी उसे परिचय हुआ, वे सब की सब उसकी कहानियों में छन आयीं। यही कारण है कि उसकी कहानियां अधिकतर चरागाहों के प्रदेश, मध्य अमरीका या न्यूयार्क में घटित होती है। शहरी जीवन की कहानियों में जिनके लिए वह प्रसिद्ध है, जीवन की विडम्बनाओं की स्वीक्रति हैं। वे उनके अपने कटु अनुभवों के प्रतिबिम्ब हैं।



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'आधुनिक यमलोक' - हास्य-प्रधान नाटक







'आधुनिक यमलोक' एक हास्य-प्रधान नाटक है जिसमे आज की भ्रष्ट व्यवस्था पर प्रहार किया गया है। यह डॉ. कैलाश चन्द्र शर्मा का लिखा हुआ नाटक है.

टाइगर, सितारा देवी, मूमल देवी, किस्मती आदि पत्रों का सुन्दर और बेजोड़ चित्रण किया गया है.

 इसे हमें झाँसी से गोपाल कश्यप ने भेजा है.

अवश्य पढ़ें ।

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'न्याय' - प्रेमचंद






'न्याय' उपन्यास-सम्राट प्रेमचंद द्वारा अनुवादित  एक प्रसिद्ध नाटक है । यह प्रसिद्ध ब्रिटिश उपन्यासकार John Galsworthy के नाटक Justice का हिंदी अनुवाद है. इसमें प्रेमचंद ने अपनी पूरी प्रतिभा का प्रयोग किया है। हालाँकि यह एक अंग्रेजी नाटक का हिंदी अनुवाद है, परन्तु इसमें प्रेमचंद की लेखनी की छाप साफ़ दिखाई देती है।

अवश्य पढ़ें।


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सोमवार, 23 अप्रैल 2012

'गबन' - मुंशी प्रेमचंद




आपने जबसे होश संभाला आप प्रेमचंद को पढ़ते और प्यार करते आये हैं। बचपन से लेकर उम्र ढलने तक प्रेमचंद आपके संग-संग चलता रहा है। निश्चय ही आप से कितनों का ही प्रेमचंद साहित्य से गहरा परिचय भी होगा और मुझे विश्वास है कि प्रेमचंद के जीवन-परिचय की मोटी-मोटी बातें भी आप काफी कुछ जानते होंगे। जैसे कि उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस शहर से चार मील दूर लमही नाम के एक गाँव में हुआ था और पिता मुंशी अजायब लाल एक डाकमुंशी थे। घर पर साधारण खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने की मुंहताजी तो न थी, पर इतना शायद कभी न हो पाया कि उधर से निश्चिंत हुआ जा सके।

'गबन' मुंशी प्रेमचंद का एक प्रसिद्ध उपन्यास है।
अवश्य पढ़ें ।

उपन्यास की एक झलक:

बरसात के दिन हैं, सावन का महीना। आकाश में सुनहरी घटाएँ छायी हुई हैं। रह-रहकर रिमझिम वर्षा होने लगती है। अभी तीसरा पहर है; पर ऐसा मालूम हो रहा है, शाम हो गयी। आमों के बाग में झूला पड़ा है। लड़कियाँ भी झूल रही हैं और उनकी माताएं भी। दो-चार झूल रही हैं, दो-चार झुला रही हैं। कोई कजली गाने लगती है, कोई बारहमासा। इस ऋतु में महिलाओं की बाल-स्मृतियाँ भी जाग उठती हैं। ये फुहारें मानों चिन्ताओं को ह्रदय से धो डालती हैं। मानों मुरझाये हुए मन को भी हरा कर देती हैं। सबके दिल उमगों से भरे हुए हैं। धानी साड़ियों ने प्रकृति की हरियाली से नाता जोड़ा है।

इसी समय एक बिसाती आकर झूले के पास खड़ा हो गया। उसे देखते ही झूला बन्द हो गया। छोटी-बड़ी सबों ने आकर उसे घेर लिया। बिसाती ने अपना सन्दूक खोला और चमकती-दमकती चीजें निकालकर दिखाने लगा। कच्चे मोतियों के गहने थे, कच्चे लैस और गोटे, रंगीन मोजे, खूबसूरत गुड़ियाँ और गुड़ियों के गहने, बच्चों के लट्टू और झुनझुने। किसी ने कोई चीज ली, किसी ने कोई चीज। एक बड़ी-बड़ी आँखोंवाली बालिका ने वह चीज पसन्द की, जो चमकती हुई चीजों में सबसे सुन्दर थी। वह फिरोजी रंग का एक चन्द्रहार था। माँ से बोली-अम्मा, मैं यह हार लूँगी।

माँ ने बिसाती से पूछा-बाबा, यह हार कितने का है ?
बिसाती ने हार को रुमाल से पोंछते हुए कहा-खरीद तो बीस आने की है, मालकिन जो चाहें दे दें।
माता ने कहा-यह तो बड़ा महँगा है। चार दिन में इसकी चमक-दमक जाती रहेगी। बिसाती ने मार्मिक भाव से सिर हिलाकर कहा-बहूजी, चार दिन में तो बिटिया को असली चन्द्रहार मिल जायेगा।
माता के हृदय पर सहृदयता से भरे हुए शब्दों ने चोट की। हार ले लिया गया।
बालिका के आनन्द की सीमा न थी। शायद हीरों के हार से भी उसे इतना आनन्द न होता। उसे पहनकर वह सारे गाँव में नाचती फिरी। उसके पास जो बाल-सम्पत्ति थी, उसमें सबसे मूल्यवान, सबसे प्रिय यही बिल्लौर का हार था।
लड़की का नाम जालपा था, माता का मानकी।


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'छत पर का कमरा' - ओ. हेनरी


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'छत पर का कमरा' प्रसिद्ध अमेरिकन लेखक ओ. हेनरी (या विलियम सिडनी पोर्टर) की कहानी है । कहानी विशुद्ध प्रेम पर आधारित है और पाठको के मन को झकझोरती है ।


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'दस्ते सबा' - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़



'दस्ते सबा' में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी का संकलन है । इसमें उनकी चुनिन्दा शायरी दी गयी है।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का जन्म सियालकोट, पाकिस्तान में हुआ था ।
वे उर्दू के बहुत ही जाने माने कवि थे । आधुनिक उर्दू शायरी को एक नई ऊँचाई दी । इसी समय उर्दू के काव्यगगन में साहीर, ईकबाल, कैफ़ि, फ़िराक़ के जैसे और भी सितारे चमक रहे थे । वे अंग्रेजी तथा अरबी में MA करने के बाद भी कबितायें उर्दू में ही लिखते थे ।
 1942 से लेकर 1947 तक वे सेना मे थे । लियाकत अली खाँ की सरकार के तख्तापलट की साजिश रचने के जुर्म में वे १९५१‍ - १९५५ तक कैद में रहे । इसी दौरान लिखी गई कविताएँ बाद में बहुत लोकप्रिय हुईं और "दस्ते सबा" तथा "जिंदानामा" नाम से प्रकाशित किया गया ।

बाद में वे 1962 तक लाहोर में पाकिस्तान आर्टस काउनसिल मे रहे । 1963 में उनको सोभियत रशिया से लेनिन शांति पुरस्कार प्रदान किया गया । भारत के साथ 1965 के युद्ध के समये वे सूचना मंत्रक मे काम किये ।  1984 में, उनके देहांत के पहले, नोबेल पुरस्कार के लिये उनका नाम सामने आया था, लेकिन यासेर अराफत के करीबी होने के कारण मिल न सका ।


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