वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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सोमवार, 31 दिसंबर 2012

नव-वर्ष की शुभकामनाएं!










'अपनी हिंदी' के सभी पाठकों को नव-वर्ष  की हार्दिक  शुभकामनाएं!
नया साल आप सभी के लिए और आपके परिवार के लिए मंगलमय हो !
                                                                          -'अपनी हिंदी' टीम 




   
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शनिवार, 29 दिसंबर 2012

अलग्योझा




'अलग्योझा' प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध  कहानी है.


प्रेमचंद (३१ जुलाई, १८८० - ८ अक्तूबर १९३६) के उपनाम से लिखने वाले धनपत राय श्रीवास्तव हिन्दी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं। उन्हें मुंशी प्रेमचंद व नवाब राय नाम से भी जाना जाता है और उपन्यास सम्राट के नाम से सम्मानित किया जाता है। इस नाम से उन्हें सर्वप्रथम बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने संबोधित किया था।

प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिस पर पूरी शती का साहित्य आगे चल सका। इसने आने वाली एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित किया और साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नीव रखी। उनका लेखन हिन्दी साहित्य एक ऐसी विरासत है जिसके बिना हिन्दी का विकास संभव ही नहीं था।

वे एक सफल लेखक, देशभक्त नागरिक, कुशल वक्ता, ज़िम्मेदार संपादक और संवेदनशील रचनाकार थे। बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में जब हिन्दी में काम करने की तकनीकी सुविधाएँ नहीं थीं इतना काम करने वाला लेखक उनके सिवा कोई दूसरा नहीं हुआ।

प्रेमचंद के बाद जिन लोगों ने साहित्‍य को सामाजिक सरोकारों और प्रगतिशील मूल्‍यों के साथ आगे बढ़ाने का काम किया, उनके साथ प्रेमचंद की दी हुई विरासत और परंपरा ही काम कर रही थी। बाद की तमाम पीढ़ियों, जिसमें यशपाल से लेकर मुक्तिबोध तक शामिल हैं, को प्रेमचंद के रचना-कर्म ने दिशा प्रदान की। 

ये पुस्तक हमें श्री अनुराग व्यास ने भेजी है .


अवश्य पढ़ें।

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ईदगाह




'ईदगाह' प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध  कहानी है.


प्रेमचंद (३१ जुलाई, १८८० - ८ अक्तूबर १९३६) के उपनाम से लिखने वाले धनपत राय श्रीवास्तव हिन्दी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं। उन्हें मुंशी प्रेमचंद व नवाब राय नाम से भी जाना जाता है और उपन्यास सम्राट के नाम से सम्मानित किया जाता है। इस नाम से उन्हें सर्वप्रथम बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने संबोधित किया था।

प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिस पर पूरी शती का साहित्य आगे चल सका। इसने आने वाली एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित किया और साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नीव रखी। उनका लेखन हिन्दी साहित्य एक ऐसी विरासत है जिसके बिना हिन्दी का विकास संभव ही नहीं था।

वे एक सफल लेखक, देशभक्त नागरिक, कुशल वक्ता, ज़िम्मेदार संपादक और संवेदनशील रचनाकार थे। बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में जब हिन्दी में काम करने की तकनीकी सुविधाएँ नहीं थीं इतना काम करने वाला लेखक उनके सिवा कोई दूसरा नहीं हुआ।

प्रेमचंद के बाद जिन लोगों ने साहित्‍य को सामाजिक सरोकारों और प्रगतिशील मूल्‍यों के साथ आगे बढ़ाने का काम किया, उनके साथ प्रेमचंद की दी हुई विरासत और परंपरा ही काम कर रही थी। बाद की तमाम पीढ़ियों, जिसमें यशपाल से लेकर मुक्तिबोध तक शामिल हैं, को प्रेमचंद के रचना-कर्म ने दिशा प्रदान की। 

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दो बैलों की कथा




'दो बैलों की कथा' प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध  कहानी है.इसमें प्रेमचंद जी ने जानवरों के माध्यम से इंसान को मिल-जुल कर रहने, प्रेमभाव रखने और वफादारी और म्हणत से अपना काम करने की सीख दी है.


प्रेमचंद (३१ जुलाई, १८८० - ८ अक्तूबर १९३६) के उपनाम से लिखने वाले धनपत राय श्रीवास्तव हिन्दी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं। उन्हें मुंशी प्रेमचंद व नवाब राय नाम से भी जाना जाता है और उपन्यास सम्राट के नाम से सम्मानित किया जाता है। इस नाम से उन्हें सर्वप्रथम बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने संबोधित किया था।

प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिस पर पूरी शती का साहित्य आगे चल सका। इसने आने वाली एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित किया और साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नीव रखी। उनका लेखन हिन्दी साहित्य एक ऐसी विरासत है जिसके बिना हिन्दी का विकास संभव ही नहीं था।

वे एक सफल लेखक, देशभक्त नागरिक, कुशल वक्ता, ज़िम्मेदार संपादक और संवेदनशील रचनाकार थे। बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में जब हिन्दी में काम करने की तकनीकी सुविधाएँ नहीं थीं इतना काम करने वाला लेखक उनके सिवा कोई दूसरा नहीं हुआ।

प्रेमचंद के बाद जिन लोगों ने साहित्‍य को सामाजिक सरोकारों और प्रगतिशील मूल्‍यों के साथ आगे बढ़ाने का काम किया, उनके साथ प्रेमचंद की दी हुई विरासत और परंपरा ही काम कर रही थी। बाद की तमाम पीढ़ियों, जिसमें यशपाल से लेकर मुक्तिबोध तक शामिल हैं, को प्रेमचंद के रचना-कर्म ने दिशा प्रदान की। 

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जुलूस




'जुलूस' प्रेमचंद जी की एक प्रसिद्ध कहानी है.


प्रेमचंद (३१ जुलाई, १८८० - ८ अक्तूबर १९३६) के उपनाम से लिखने वाले धनपत राय श्रीवास्तव हिन्दी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं। उन्हें मुंशी प्रेमचंद व नवाब राय नाम से भी जाना जाता है और उपन्यास सम्राट के नाम से सम्मानित किया जाता है। इस नाम से उन्हें सर्वप्रथम बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने संबोधित किया था।

प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिस पर पूरी शती का साहित्य आगे चल सका। इसने आने वाली एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित किया और साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नीव रखी। उनका लेखन हिन्दी साहित्य एक ऐसी विरासत है जिसके बिना हिन्दी का विकास संभव ही नहीं था।

वे एक सफल लेखक, देशभक्त नागरिक, कुशल वक्ता, ज़िम्मेदार संपादक और संवेदनशील रचनाकार थे। बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में जब हिन्दी में काम करने की तकनीकी सुविधाएँ नहीं थीं इतना काम करने वाला लेखक उनके सिवा कोई दूसरा नहीं हुआ।

प्रेमचंद के बाद जिन लोगों ने साहित्‍य को सामाजिक सरोकारों और प्रगतिशील मूल्‍यों के साथ आगे बढ़ाने का काम किया, उनके साथ प्रेमचंद की दी हुई विरासत और परंपरा ही काम कर रही थी। बाद की तमाम पीढ़ियों, जिसमें यशपाल से लेकर मुक्तिबोध तक शामिल हैं, को प्रेमचंद के रचना-कर्म ने दिशा प्रदान की। 

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पंच, पंचायत और पंचायती राज

 यह पुस्तक पंचायती राज व्यवस्था के बारे में जानकारी देती है.


पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम, तालुका, और जिला आते हैं । भारत मे प्रचीन काल से ही पंचायती राज व्यवस्था आस्तित्व में रही हैं ।


भारतीय संविधान के अनिच्छेद ४० में राज्यं को पंचायतों के गठन का निर्देश दिया गया हैं । ९९३ मैं संविधान में ७३वां संविधान संशोधन अधिनियम एक्ट, १९९२ करके पंचायत राज संस्था को संवैधानिक मान्यता दे दी गयी हैं ।

  • बलवंत राय मेहता समिती की सिफारिशें (1957)
  • अशोक मेहता समिती की सिफारिशें (1977)
  • डा. पी.वी.के. राव समिती (1985)
देश में सर्वप्रथम पंचायत राज की स्थापना में राजस्थान राज्य अगुवा बना। राजस्थान में 2 सितम्बर 1959 को पंचायत समिति और जिला परिषद अधिनियम पारित कर 2 अक्टूबर 1959 से क्रियान्वित किया गया। भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने राजस्थान के नागौर जिले में पंचायती राज का उद्घाटन कर ग्रामीण विकास के पहले चरण का सूत्रपात किया। राजस्थान की पहल पर 11 अक्टूबर 1959 को आन्ध*प्रदेश में, 196॰ में आसाम, कर्नाटक और मद्रास में, 1962 में महाराष्ट्र में तथा 1964 में पश्चिमी बंगाल में यह व्यवस्था लागू की गई। बाद में धीरे-धीरे यह व्यवस्था कुछ जगहों को छोडकर पूरे देश में लागू की गई।




 फाइल का आकार: 1 Mb


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1857 की झांकियां

 '1857 की झांकियां' राजकुमार द्वारा लिखित एक नाटक है.  
यह १८५७ की क्रांति पर आधारित है.


सिपाही स्वतंत्रता संग्राम का प्रारम्भ मेरठ से 10 मई, 1857 ई. को हुआ, परन्तु इसके पूर्व ही बरहामपुर और बैरकपुर की छावनियों के सैनिकों में असन्तोष के लक्षण प्रकट हो चुके थे। 28 मार्च, 1857 ई. को मंगल पाण्डे नामक सैनिक ने दिन-दहाड़े एक अंग्रेज़ पदाधिकारी को मार डाला था, परन्तु यह विद्रोह दबा दिया गया। फिर भी विद्रोहाग्नि भीतर ही भीतर धधकती रही और ग्रीष्म ऋतु के मध्य में इसकी ज्वाला भड़क उठी। 





इसके राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और सैनिक कई कारण थे। लॉर्ड डलहौज़ी द्वारा गोद प्रथा का अन्त तथा देशी राज्यों को कुशासन के बहाने हड़पने की नीति से भारतीय राज्यों के शासकों को अपना सिंहासन बचाने की चिन्ता पीड़ित करने लगी। दूसरी ओर गद्दी से हटाये गए शासक तथा उनके आश्रित बेकारी तथा अर्थाभाव से पीड़ित होकर अंग्रेज़ों से द्वेष करने लगे। ऐसे अपदस्थ शासकों में से पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने विद्रोह को संगठित करने में प्रमुख एवं सक्रिय भाग लिया। झाँसी की रानी ने मृत्यु पर्यन्त अंग्रेज़ों से वीरता पूर्वक युद्ध किया।





 फाइल का आकार: 2 Mb

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शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

एक गधे की वापसी - हास्य-व्यंग्य ( कृशन चंदर)


 कृष्ण चंदर  भारत के जाने माने कहानीकार-उपन्यासकार थे. एक गधे की आत्मकथा नामक उनका व्यंग्यात्मक उपन्यास खासा चर्चित रहा था. एक गधे की वापसी में उनकी व्यंग शैली की झलक मिलती है।

कृष्ण चंदर को साहित्य एवं शिक्षा क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन १९६९ में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। ये महाराष्ट्र से थे ।


साइज़: 200 Kb



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स्वपनदर्शी इंजीनियर विश्वेश्रैया




 15 सितम्बर को विश्वेश्रैया  जी की  याद में  इंजीनियरस डे  मनाया जाता है . उन्ही की याद में प्रस्तुत है ये पुस्तक - स्वपनदर्शी इंजीनियर विश्वेश्रैया

डा. विश्वेश्रैया का नाम विश्व में प्रसिद्ध है। डा. विश्वेश्रैया ने अभियंत्रण विभाग को पहचान दी है। सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण की तकनीक में उनके योगदान को भूलाया नहीं जा सकता।
मैसूर राज्य के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया अपने समय के सबसे महान अभियंता थे जिन्होंने बांध और सिंचाई व्यवस्था के लिए नए तरीकों का इजाद किया।  विश्वेसरैया अपने समय के महान इंजीनियर थे। उन्होंने आधुनिक भारत में सिंचाई की बेहतर व्यवस्था और नवीनतम तकनीक पर आधारित नदी पर बांध बनाए तथा पनबिजली परियोजना शुरू करने की जमीन तैयार की। वह आधुनिक भारत के पहले महान इंजीनियर थे।

विश्वेसरैया ने कावेरी नदी पर उस समय एशिया के सबसे बड़े जलाशय का निर्माण किया और बाढ़ बचाव प्रणाली विकसित कर हैदराबाद पर मंडराते बाढ़ के खौफ को खत्म किया। इससे उन्हें खूब शोहरत मिली। 1912 में मैसूर राज्य के राजा ने उन्हें अपना दीवान नियुक्त किया और 1918 तक इस पद पर रहते हुए उन्होंने सैकड़ों स्कूल, सिंचाई की बेहतर सुविधा और कई अस्पताल समेत अनेकों विकासन्नोमुखी कार्य किए।

विश्वेसरैया के उल्लेखनीय कार्यो को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1955 में सर्वाेच्च नागरिक अलंकरण 'भारत रत्न' से सम्मानित किया। उनके नाम पर पूरे भारत खासकर कर्नाटक में कई शिक्षण संस्थान हैं तथा उनके जन्मदिन को इंजीनियर दिवस के रूप में मनाया जाता है तथा इस उपलक्ष्य में कर्नाटक के कुछ हिस्सों में सार्वजनिक अवकाश रहता है।

विश्वेसरैया को 'सर एमवी' और 'आधुनिक मैसूर का पितामह' भी कहा जाता है। 15 सितंबर, 1861 को विश्वेश्रैया का जन्म कर्नाटक के कोलार जिले के चक्कबल्लारपुर तलुका के मुद्देनभल्ली गांव में पारंपरिक और सांस्कृतिक रूप से धनाढ़य परिवार में हुआ था। उनके पिता संस्कृत के विद्वान थे। प्रारंभिक शिक्षा गांव में पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए वह बेंगलूर आए, लेकिन आर्थिक तंगी ने उन्हें कई तरह की विपरीत परिस्थतियों का सामना करने के लिए मजबूर किया।

1881 में बीए करने के बाद मैसूर सरकार के सहयोग से पुणे के एक इंजीनियरिंग कालेज में उन्होंने दाखिला लिया और प्रथम स्थान हासिल किया। नासिक में सहायक अभियंता के पद पर नियुक्ति के साथ उनकी नौकरी की शुरुआत हुई।




 फाइल का आकार: 4 Mb



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गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

'क्षितिज की संतान' - उपन्यास



'क्षितिज की संतान' एक पौराणिक घटनाक्रम पर आधारित  उपन्यास है । इसे राजश्री ने लिखा है।

क्षितिज की संतान के दो प्रमुख नायक है - वैदिक व् पौराणिक युगीन महा असुर वरुण एवं महा रूद्र शिव।

पाठकों की विशेष मांग पर उपन्यास के नए लिंक उपलब्ध करवा दिए गए  है .

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पृष्ठ संख्या: 448


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गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

8 सेर चावल - कहानी संग्रह


8 सेर चावल कहानी संग्रह में उप-राज्यपाल रह चुके के. संथानम  की १२ तमिल कहानियों का हिंदी रूपांतरदिया गया है जो उन्होंने सत्याग्रह आन्दोलन के दौरान जेल में रहते हुए लिखी थी। इन कहानियों का रचनाकाल १९४० के आसपास का है।
आशा है, आपको ये कहानियां पसंद आएगी।


पृष्ठ संख्या: १५०
साइज़: 8 MB

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5 कहानियां - सुमित्रानंदन पन्त (कहानी संग्रह)


सुमित्रानंदन पंत (२१ मई १९०० - २८ सितंबर १९७७) हिंदी में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं।

बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध छायावादी कवियों का उत्थान काल था। सुमित्रानंदन पंत उस नये युग के प्रवर्तक के रूप में हिन्दी साहित्य में उदित हुए। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और रामकुमार वर्मा जैसे छायावादी प्रकृति उपासक-सौन्दर्य पूजक कवियों का युग कहा जाता है।

सुमित्रानंदन पंत का प्रकृति चित्रण इन सबमें श्रेष्ठ था। उनका जन्म ही बर्फ़ से आच्छादित पर्वतों की अत्यंत आकर्षक घाटी अल्मोड़ा में हुआ था, जिसका प्राकृतिक सौन्दर्य उनकी आत्मा में आत्मसात हो चुका था। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भंवरा गुंजन, उषा किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक व बिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था, गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, उंची नाजुक कवि का प्रतीक समा शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था।

कवि के रूप में तो आप श्री सुमित्रानंदन पन्त से परिचित है ही, अब आप उनकी लिखी हुई ये दुर्लभ कहानियां भी पढ़कर देखिये। आशा है, आपको ये कहानियां पसंद आएगी।

आकार : MB
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मंगलवार, 13 नवंबर 2012

शुभ दीपावली





'दीपावली' के शुभ  अवसर पर 'अपनी हिंदी'  परिवार की तरफ से सभी साहित्य प्रेमियों को  हार्दिक शुभकामनाएं ! आपकी दिवाली मंगलमय हो!
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सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

दर्प-चूर्ण - उपन्यास (शरत चन्द्र)



दर्प-चूर्ण शरत चन्द्र का एक सामाजिक उपन्यास है जिसमे एक परिवार की कहानी दिखाई गयी है. इसमें बताया गया है कि एक नारी का झूठे अंह किस तरह से उसकी गृहस्थी को तबाह कर सकता है।

शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय (१५ सितंबर, १८७६ - १६ जनवरी, १९३८ ) बांग्ला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार थे। उनका जन्म हुगली जिले के देवानंदपुर में हुआ। वे अपने माता-पिता की नौ संतानों में से एक थे। अठारह साल की अवस्था में उन्होंने इंट्रेंस पास किया। इन्हीं दिनों उन्होंने "बासा" (घर) नाम से एक उपन्यास लिख डाला, पर यह रचना प्रकाशित नहीं हुई। रवींद्रनाथ ठाकुर और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। शरतचन्द्र ललित कला के छात्र थे लेकिन आर्थिक तंगी के चलते वह इस विषय की पढ़ाई नहीं कर सके। रोजगार के तलाश में शरतचन्द्र बर्मा गए और लोक निर्माण विभाग में क्लर्क के रूप में काम किया। कुछ समय बर्मा रहकर कलकत्ता लौटने के बाद उन्होंने गंभीरता के साथ लेखन शुरू कर दिया। बर्मा से लौटने के बाद उन्होंने अपना प्रसिद्ध उपन्यास श्रीकांत लिखना शुरू किया। बर्मा में उनका संपर्क बंगचंद्र नामक एक व्यक्ति से हुआ जो था तो बड़ा विद्वान पर शराबी और उछृंखल था। यहीं से चरित्रहीन का बीज पड़ा, जिसमें मेस जीवन के वर्णन के साथ मेस की नौकरानी से प्रेम की कहानी है।

 जब वह एक बार बर्मा से कलकत्ता आए तो अपनी कुछ रचनाएँ कलकत्ते में एक मित्र के पास छोड़ गए। शरत को बिना बताए उनमें से एक रचना "बड़ी दीदी" का १९०७ में धारावाहिक प्रकाशन शुरु हो गया। दो एक किश्त निकलते ही लोगों में सनसनी फैल गई और वे कहने लगे कि शायद रवींद्रनाथ नाम बदलकर लिख रहे हैं। शरत को इसकी खबर साढ़े पाँच साल बाद मिली। कुछ भी हो ख्याति तो हो ही गई, फिर भी "चरित्रहीन" के छपने में बड़ी दिक्कत हुई। भारतवर्ष के संपादक कविवर द्विजेंद्रलाल राय ने इसे यह कहकर छापने से इन्कार कर दिया किया कि यह सदाचार के विरुद्ध है। विष्णु प्रभाकर द्वारा आवारा मसीहा शीर्षक रचित से उनका प्रामाणिक जीवन परिचय बहुत प्रसिद्ध है।

प्रमुख कृतियाँ

शरत्चंद्र ने अनेक उपन्यास लिखे जिनमें पंडित मोशाय, बैकुंठेर बिल, मेज दीदी, दर्पचूर्ण, श्रीकांत, अरक्षणीया, निष्कृति, मामलार फल, गृहदाह, शेष प्रश्न, दत्ता, देवदास, बाम्हन की लड़की, विप्रदास, देना पावना आदि प्रमुख हैं। बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन को लेकर "पथेर दावी" उपन्यास लिखा गया। पहले यह "बंग वाणी" में धारावाहिक रूप से निकाला, फिर पुस्तकाकार छपा तो तीन हजार का संस्करण तीन महीने में समाप्त हो गया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने इसे जब्त कर लिया।

शरत के उपन्यासों के कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुए हैं। कहा जाता है कि उनके पुरुष पात्रों से उनकी नायिकाएँ अधिक बलिष्ठ हैं। शरत्चंद्र की जनप्रियता उनकी कलात्मक रचना और नपे तुले शब्दों या जीवन से ओतप्रोत घटनावलियों के कारण नहीं है बल्कि उनके उपन्यासों में नारी जिस प्रकार परंपरागत बंधनों से छटपटाती दृष्टिगोचर होती है, जिस प्रकार पुरुष और स्त्री के संबंधों को एक नए आधार पर स्थापित करने के लिए पक्ष प्रस्तुत किया गया है, उसी से शरत् को जनप्रियता मिली। उनकी रचना हृदय को बहुत अधिक स्पर्श करती है।

उनके कुछ उपन्यासों पर आधारित हिन्दी फिल्में भी कई बार बनी हैं। इनके उपन्यास चरित्रहीन पर आधारित १९७४ में इसी नाम से फिल्म बनी थी। उसके बाद देवदास को आधार बनाकर देवदास फ़िल्म का निर्माण तीन बार हो चुका है। पहली देवदास कुन्दन लाल सहगल द्वारा अभिनीत, दूसरी देवदास दिलीप कुमार, वैजयन्ती माला द्वारा अभिनीत तथा तीसरी देवदास शाहरुख़ ख़ान, माधुरी दीक्षित, ऐश्वर्या राय द्वारा अभिनीत। इसके अतिरिक्त १९७४ में चरित्रहीन, परिणीता-१९५३ और २००५ में भी , बड़ी दीदी (१९६९) तथा मँझली बहन, आदि पर भी चलचित्रों के निर्माण हुए हैं।

अवश्य पढ़े ।

पृष्ठ :40
फाइल का आकर: 3 MB 


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शनिवार, 22 सितंबर 2012

सौंफ-चिकित्सा



रसोई में पाई जाने वाली सौंफ चाय बनाने से लेकर, खाना खाने के बाद मुख शोधक के रूप में खाने में प्रतिदिन काम लाई जाती है। प्रतिदिन प्रयोग में आने वाले मसालों में इसका विशिष्ट स्थान है।

'सौंफ-चिकित्सा ' पुस्तक में सौंफ का विभिन्न घरेलु नुस्खों में उपयोग बताया गया हैहर व्यक्ति के पढने लायक पुस्तक है
सौंफ का प्रयोग अचार के मसाले में किया जाता है।
पान खाने वाले पान में सौंफ को विशेष स्थान देते हैं।
मुख शुद्धि के रूप में सौंफ का प्रयोग किया जाता है।
ठंडाई आदि बनाते समय सौंफ का प्रयोग मुख्य रू प में किया जाता है।
आम की चटनी और चाय आदि में सौंफ का प्रयोग सुगंघ के लिए किया जाता है।
सौंफ पेट के रोगियों के लिए रामबाण औषधि है। सौंफ नेत्र रोग नाशक, कफनाशक, बुद्धिवर्द्धक पाचक के रू प में बहुत लाभदायक माना जाता है।
नेत्र ज्योति में वृद्धि के लिए सौंफ, बादाम और मिश्री समान भाग में पीस लें। एक चम्मच सुबह-शाम पानी के साथ दो माह तक लें। लगातार सेवन से आंखों की कमजोरी दूर होती है।
गले में खारिश होने पर सौंफ को मुंह में चबाते रहने से बैठा गला साफ हो जाता है।
सौंफ रक्त वर्ण को साफ करने वाली है एवं चर्म रोग नाशक है।
गर्मी के दिनों में ठंडाई में सौंफ मिलाकर पीजिए। इससे गर्मी शांत होगी और जी मिचलाना बंद हो जाएगा।
पेट दर्द होने पर भुनी हुई सौंफ चबाइए। तुरंत आराम मिलेगा।
पेट में वायु प्रकोप होने पर दाल तथा
सब्जी में सौंफ का छौंक कुछ दिनों तक प्रयोग में लाएं।
खट्टी डकारें आने पर थोड़ी सी सौंफ पानी में उबालकर मिश्री डालकर पीजिए। दो-तीन बार प्रयोग से आराम मिल जाएगा।
सौंफ-चिकित्सा

पृष्ठ संख्या: 50
आकार: 4 Mb

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शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

अब तो नींद खुले - नाटक


'अपनी हिंदी' में इस बार पेश है - एक नाटक - अब तो नींद खुले
श्री रामजीवन चौधरी द्वारा लिखा गया ये नाटक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित है। नाटक पढने में रोचक है। उम्मीद है नाटक सभी साहित्य प्रेमियों को पसंद आएगा।

पृष्ठ संख्या: 66
आकार: 2 MB


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गुरुवार, 20 सितंबर 2012

मीनाक्षी - काव्य संग्रह


'मीनाक्षी' श्री नन्दलाल भारती का काव्य संग्रह है। इसमें दी गयी कवितायेँ बहुत सुंदर है और पढने योग्य है।
अवश्य पढ़ें ।


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बुधवार, 19 सितंबर 2012

अभिशाप - उपन्यास




'अभिशाप' श्री नन्दलाल भारती का एक बेहतरीन उपन्यास है जो देश की जवलंत समस्याओं पर प्रहार करता है।

इनकी रचनाओं का देश की कई पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन होता रहता है।

इनकी प्रमुख कृतिया इस प्रकार है -

उपन्यास-अमानत, प्रतिनिधि पुस्तकें- काली मांटी, निमाड की माटी मालवा की छाँव,ये आग कब बुझेगी । उपन्यास-दमन,चांदी की हँसुली एवं अभिशाप, कहानी संग्रह-मुट्ठी भर आग, हँसते जख़्म एवं सपनों की बारात, लघुकथा संग्रह-उखड़े पाँव, कतरा-कतरा आँसू एवं एहसास । काव्यसंग्रह -कवितावलि, काव्यबोध । आलेख संग्रह-विमर्श एवं अन्य ।


फाइल का आकार: ३ Mb

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यश का शिकंजा - व्यंग्य उपन्यास



यश का शिकंजा - श्री यशवंत कोठारी का व्यंग्य उपन्यास है।

यशवंत कोठारी के व्यंग्य आज की भौतिकवादी मानसिकता पर जमकर प्रहार करते है और आत्मचिंतन करने पर मजबूर करते हैं कि आखिर यह प्रवृत्ति हमें कहाँ ले जाएगी !

अवश्य पढ़ें।

फाइल का आकार: १ Mb


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ऐतिहासिक उपन्यास - वसंत सेना


आप सभी के लिए पेश है एक ऐतिहासिक उपन्यास - वसंत सेना


वसंतसेना राजा पलाका के दरबार में नर्तकी होती है। लेकिन राजा के साले संस्थानक की गंदी नज़र से अपने आप को बचते बचाते वो चित्रकार चारुदत्त के घर में आश्रय लेती है। यह जानते हुए भी कि चारुदत्त विवाहित हैं अदिती से और उनके पास कोई रोज़गार नहीं है, वसंतसेना उससे प्यार कर बैठती है, और उनका प्रेम संबंध शुरु हो जाता है।कहानी की नायिका वसंत सेना एक ऐतिहासिक चरित्र है

आगे क्या होता है, जानने के लिए पढ़िए - 'वसंत सेना'

इस पुस्तक को हमारे पास श्री अक्षय कुमार ओझा ने भेजा है। इसके लिए उनका धन्यवाद्।

फाइल का आकार: 700 Kb


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मंगलवार, 18 सितंबर 2012

'असत्यम, अशिवम , असुन्दरम'



'असत्यम, अशिवम , असुन्दरम' श्री यशवंत कोठारी का व्यंग्य उपन्यास है।

यशवंत कोठारी के व्यंग्य आज की भौतिकवादी मानसिकता पर जमकर प्रहार करते है और आत्मचिंतन करने पर मजबूर करते हैं कि आखिर यह प्रवृत्ति हमें कहाँ ले जाएगी !

लेखक के लगभग १००० लेख, निबन्ध, कहानियाँ, आवरण कथाएँ, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, राजस्थान पत्रिका, भास्कर, नवज्योती, राष्ट्रदूत साप्ताहिक, अमर उजाला, नई दुनिया, स्वतंत्र भारत, मिलाप, मधुमती, स्वागत आदि में प्रकाशित/ आकाशवाणी / दूरदर्शन ...इन्टरनेट से प्रसारित है ।

कार्यक्षेत्र-
देश-विदेश में दस राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनारों में आमंत्रित / भाग लिया राजस्थान साहित्य अकादमी की समितियों के सदस्य १९९१-९३, १९९५-९७, ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार की हिन्दी समिति के सदस्य-२०१०-१३

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