वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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शनिवार, 20 अगस्त 2011

हिन्दू जाति का उत्थान और पतन




प्रस्तुत पुस्तक में हिन्दू जाति का इतिहास दिया गया है

"हिन्दू" शब्द "सिन्धु" से बना माना जाता है। संस्कृत में सिन्धु शब्द के दो मुख्य अर्थ हैं - पहला, सिन्धु नदी जो मानसरोवर के पास से निकल कर लद्दाख़ और पाकिस्तान से बहती हुई समुद्र मे मिलती है, दूसरा - कोई समुद्र या जलराशि।

ऋग्वेद की नदीस्तुति के अनुसार वे सात नदियाँ थीं : सिन्धु, सरस्वती, वितस्ता (झेलम), शुतुद्रि (सतलुज), विपाशा (व्यास), परुषिणी (रावी) और अस्किनी (चेनाब)। एक अन्य विचार के अनुसार हिमालय के प्रथम अक्षर "हि" एवं इन्दु का अन्तिम अक्षर "न्दु", इन दोनों अक्षरों को मिलाकर शब्द बना "हिन्दु" और यह भूभाग हिन्दुस्थान कहलाया।

हिन्दू शब्द उस समय धर्म की बजाय राष्ट्रीयता के रुप में प्रयुक्त होता था। चूँकि उस समय भारत में केवल वैदिक धर्म को ही मानने वाले लोग थे, बल्कि तब तक अन्य किसी धर्म का उदय नहीं हुआ था इसलिये "हिन्दू" शब्द सभी भारतीयों के लिये प्रयुक्त होता था। भारत में केवल वैदिक धर्मावलम्बियों (हिन्दुओं) के बसने के कारण कालान्तर में विदेशियों ने इस शब्द को धर्म के सन्दर्भ में प्रयोग करना शुरु कर दिया।



यह पुस्तक हमें श्री अनिल शर्मा ने दिल्ली से भेजी है




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12 टिप्पणियां:

बेनामी ने कहा…

hi
i am a big supporter of apnihindi and i appreciate what you people are doing but uploading a anti-hindu book like "hindu jaati ka utthan n patan" is preposterous..plz remove it as soon as possible..didnt expect this kind of work from you guys..
such a shame...

बेनामी ने कहा…

today is janmashtami and u have uploaded a book whih not only criticize hindu dharma but goes to the extent of abusing ram and krishna..
i demand you to remove this book without any delay..and redeem yourself...

Admin on 21/8/11 5:55 pm ने कहा…

यह पुस्तक सिर्फ पढने के उद्देश्य से प्रस्तुत की गयी है. इसके विचारों से सहमत होना न ही हमारे लिए आवश्यक है और न ही आपके लिए. हमारे सुधि पाठक खुद विचार करने की क्षमता रखते है कि क्या सही है और क्या गलत?

-Admin

बेनामी ने कहा…

g maaf kare lakin ye kitab ek amulya vastu hai..
agar aap logo is kitab se muskil hai to ise chhid de, agar aapne dharm me koi khami hai to use uzajar karne me koi harz nahi hai..

बेनामी ने कहा…

लगता है श्री रजनीकान्त शास्त्री जी को उनके अपने स्वजन हिन्दू भाईयों ने बहुत बुरी तरह सताया है तभी इतनी मेहनत करके संस्कृत के श्लोकों को इच्छानुसार संधिविच्छेद द्वारा (दुर्भाग्यवश संस्कृत में ये अत्यंत सरल है) तोड़ मरोड़कर उनके अर्थ का अनर्थ बनाकर इतनी मोटी पुस्तक लिख डाली. लेखक अपने इस दुराग्रहपूर्ण घ्रणित प्रयास में इतना आगे बढ़ गया कि उसने स्वयं परमपितापरमात्मा को भी अपने व्यंगबाणों, अपनी गालियों से लांछित करने का प्रयास किया है संस्कृत का उत्तम छात्र होने के नाते मैं यदि चाहूँ तो लेखक द्वारा उद्धवरित श्लोकों कि व्याख्या कर एवं इसी पुस्तक में सन्दर्भ के अनुसार उसी उदाहरण का भिन्न अर्थ लिखने का प्रश्न उठा कर आसानी से पूरी पुस्तक का खंडन कर सकता हूँ परन्तु इसके द्वारा मैं इस अवांछनीय पुस्तक को व्यर्थ का प्रचार नहीं देना चाहता. मेरा अन्य पाठको से भी यही अनुरोध है कि इस पुस्तक की चर्चा करके लेखक एवं पुस्तक को व्यर्थ का प्रचार न दें. इस पुस्तक में ये सिद्ध करने का प्रयास किया गया है सनातन(या तथाकथित हिन्दू) धर्म एवं धर्मावलम्बी अपने धर्म एवं अपने आप को सर्वश्रेष्ठ समझते हैं जबकि लेखक के कपोलकल्पित प्रमाणों के अनुसार वो संसार के निकृष्टतम प्राणी हैं यही इस पुस्तक का मुख्य विषय है. जिसका (उनकी इतनी मोटी पुस्तक का) खंडन मैं निम्नलिखित चंद पक्तियों (मात्र) में किये देता हूँ. अपने व्यवहारिक कथन को सिद्ध करने के लिए मुझे किसी प्रमाण की भी आवश्यकता नहीं है -
1. सनातन(या तथाकथित हिन्दू) धर्म में कही अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ नहीं बताया गया है बल्कि सर्वधर्म समान एवं वन्दनीय बताये गए हैं श्री रजनीकान्त शास्त्री जी स्वयं हिन्दू(सनातन धर्मी) हैं यदि उनके घर में कभी पुरोहित द्वारा पूजा, हवन इत्यादी हुआ होगा तो पूजा समाप्ति के समय पुरोहित द्वारा इसप्रकार की (सर्वधर्म समान एवं वन्दनीय ) की स्तुति अवश्य ही की करवाई होगी, जो श्री रजनीकान्त शास्त्री जी ने सुनी एवं की होगी.
२. सनातन/हिन्दू धर्मावलम्बियों ने कभी अपने आपको सर्वश्रेष्ठ तथा दूसरो को निकृष्ट नहीं माना इसका सबसे बड़ा प्रमाण ये है कि हमने कभी दूसरे धर्मावलम्बियों को धर्म परिवर्तन हेतु आकृष्ट करने का प्रयत्न नहीं किया .
३. सनातन/हिन्दू धर्मावलम्बियों के सरल स्वभाव एवं सीधे होने का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि इस पुस्तक पर किसी प्रकार का हो हल्ला नहीं है जबकि यदि किसी अन्य धर्म के बारे में किसी लेखक ने ऐसी घृणा अपनी पुस्तक में उड़ेली होती तो उसे लेने के देने पड़ जाते (सलमान रुश्दी का उदाहरण विश्व के सामने है).
अंत में लेखक के सारे परिश्रम(अनर्गल प्रलाप ही सही) पर अपनी चंद पक्तियों द्वारा पानी फेर देने के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ. एक सभ्रांत परिवार का होने के नाते मैं इसे अपना कर्त्तव्य समझता हूँ.

आपका

संजय अग्निहोत्री

बेनामी ने कहा…

नमस्कार मित्रो ! आचार्य रजनीकांत शास्त्री द्वारा लिखित यह पुस्तक मैंने दो बार पड़ी है ! केवल हल्ला करने से या इसका विरोध भर करने से सच्चाई नहीं बदल सकती ! आचार्य ने स्वयं लिखा है जिन भी प्रबुद्ध जनों को इसके अर्थ में शंका हो वे स्वयं मूल ग्रंथो से मिलान कर उसका अर्थ देख लेवे ! इच्छानुसार संधिविच्चेद करने का प्रश्न ही नहीं है ..क्यों कि ...जिन ग्रंथो का सन्दर्भ दिया गया है उनमे भी यही अर्थ लगाया गया है..!
मैंने वाल्मीकि रामायण के श्लोको का मिलान किया है .उसे सही पाया..! इसी प्रकार भागवत एवं मनुस्मृति के के उदाहरण भी सही पाए गए.....! महाभारत के जितने भी श्लोक ऑनलाइन उपलब्ध है वे पुरे नहीं है.....अतः मिलान नहीं हो सका ....मुझे नहीं लगत्ता की शास्त्री जी ने कोई गलत बात शिद्ध करने के लिए तथा गलत प्रयोजन से यह किताब लिखी होगी.?..पुस्तक की प्रस्तावना १९४४ में लिखी गई है.....जहाँ जहाँ भी श्लोक दिए गए है वे सन्दर्भ सहित है...कोई भी व्यक्ति उसका मिलान कर सकता है....! मै समझता हूँ ..हमारे पूर्वजो के लिखे यह ग्रन्थ जिनके उदाहरण यहाँ दिए गए है...इससे उनकी महानता पर कोई प्रश्न चिन्ह उपस्थित नहीं होता है.?.....आचार्य(लेखक ) का उद्देश्य केवल यह रहा है..कि जिन्हें भी अपनी जाति का घमंड है... वे अपने गिरेबान में झाक कर देख ले.....सभी जातिया और वर्ण ...किसी का भी खून शुद्ध नहीं है...?अतः भारत की मूल समस्या वर्ण व्यवस्था और जातिवाद पर यह करारा तमाचा है..येसा मेरा मानना है.....!..प्रबुद्ध पाठक स्वयं ...निर्णय करें .......
आकाश

बेनामी ने कहा…

आकाशजी ने तो पुस्तक की वि्षय वस्तु ही संकीर्ण कर दी। पहले मैने सोचा था कि मैं आकाशजी के पत्र का उत्तर नहीं दूँगा क्योंकि मैं इस पुस्तक को व्यर्थ का प्रचार नहीं देना चाहता परन्तु बहुत सोचविचार के बाद फ़िर मैंने अपने से तर्क किया कि कहीं मेरे मौन का तात्पर्य स्वीकृति न समझ लिया जाय अत: इस पत्र को मेरी अस्वीकृति समझे अब मैं इस सम्बन्ध में और पत्रव्यवहार नही करूँगा या यों कहें कि आगे लिखे जाने वाले किसी भी पत्र का उत्तर भी यही पत्र है।
हिन्दू धर्म के किसी समाज में, किसी पुस्तक में, कहीं भी रक्त मिश्रण(सभ्य समाज में विवाह द्वारा) बुरा या वर्जित नहीं बताया गया है विवाह के समय विशेष तौर से जन्म पत्री देखते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है. क्योंकि उच्च गुणों वाले रक्त मिश्रण(विवाह द्वारा) से उत्पन्न संतान में ये गुण, गुणित होते पाये गये हैं जन्म पत्री मिलाने का यही कारण आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी विचारा है. (हाँ इसका विलोम अवश्य वर्जित है वैसे भी दुर्गुणी का वहिष्कार समाज तो क्या माता पिता तक कर देते हैं ।) इस सन्दर्भ के उदहरण स्वरूप, अभिज्ञानशाकुन्तलम् में शकुन्तला पर मोहित राजा दुष्यंत से जब प्रश्न किया गया की आप जैसे उच्चकुलिन क्षत्रिय का बिना कन्या के बारे में जाने इस प्रकार आसक्त होजाना शोभा नही देता, तो दुष्यंत ने उत्तर दिया की मेरे उसी उच्च कुल से मिले संस्कारों (गुणों) ने मुझे यह सामर्थ्य दी है कि अच्छे बुरे(यानिकि गुणों में) भेद कर सकूँ. वस्तुत हिन्दूओं में गुण ही सदैव विवाह का आधार रहे हैं । जनसाधारण में भी यही चलन है कि लोग बड़े गर्व से बताते हैं हमारे अमुक पूर्वज अमुक गुणी कुल के थे जोकि इतने बहादुर, विद्वान इत्यादि थे (अर्थात हमारी धमनियों में उनका भी रक्त दौड़ रहा है) अथवा हमने अपनी कन्या अमुक उच्चगुणी कुल में ब्याही है. मैंने आज तक किसी को किसी गुनी परिवार के गुणवान पुत्र या पुत्री से विवाह हेतु इनकार करते न सुना न देखा है( फिल्मों को छोड़कर)। पता नहीं लेखक को कहाँ ऐसे व्यक्ति मिल गए जोकि सामान रक्त में विवाह को न केवल उचित बताते हैं बल्कि उसपर गर्व का अनुभव भी करते हैं। मेरी जानकारी के अनुसार तो सामान रक्त में विवाह मुस्लिम सम्प्रदाय में होता है.
मेरे विचार से आपके तथाकथित आचार्यजी या तो किन्हीं अत्यंत निम्न कोटि(दुर्गुणी) के व्यक्तियों में उठते बैठते हैं या काछिराम कि तरह उनके साथ भी कोई दुर्घटना हुई है क्योंकि काछिराम ने भी एक इसी प्रकार कि किताब लिखी थी (जोकि जगविदित है कि क्यों लिखी थी) इन दो में से एक या दोनों कारणों के अतिरिक्त कोई तीसरा कारण मेरी समझ में नहीं आता क्योंकि प्रथम एवं अंतिम कुछ पृष्ठों को छोड़कर या यों कहे कि प्रथम एवं अंतिम कुछ पृष्ठों में लिखे कपोल कल्पित रक्तमिश्रण की आड़ में पूरी पुस्तक में बड़ी चतुराई से संदर्भों को छिपाते हुए देवी देवताओं और यहां तक कि उस परम्पितापर्मात्मा पर भी अत्यंत घ्रणित ढंग से कीचड़ उछालने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं किया गया है संदर्भो को छिपाने से मेरा तात्पर्य क्या है,यह स्पष्ट करने के लिए मैं मानस का एक उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ -
सपनेहु बानर लंका जारी । जातुधान सेना सब मारी ॥
अब यदि सन्दर्भ न बताये तो यह कह सकते हैं कि लंका तो सपने में जली थी हनुमान जी ने तो जलाई नहीं. परन्तु यदि सन्दर्भ के साथ पढ़ें तो अर्थ स्पष्ट हो जाता है कि ये सपना लंका के जलने से पहले देखा गया था और लंका बाद में जली। अत: केवल श्लोकों का अर्थ मिलान कर लेने से तात्पर्य स्पष्ट नही हो जाता । मैंने जानबुझकर लेखक की पुस्तक का उदाहरण न लेकर मानस का उदाहरण लिया क्योंकि मैं इस पुस्तक को व्यर्थ का प्रचार नहीं देना चाहता अन्यथा मैं इसी प्रकार इस पूरी पुस्तक का खंडन कर सकने में समर्थ हूँ (ऐसा उपरोक्त उदाहरण से स्पष्ट है और मैंने अपने पिछले पत्र में भी कहा था)। या यदि आपके आचार्यश्री की भाषा में कहूँ तो पूरी पुस्तक की धज्जियाँ उड़ा सकने में समर्थ हूँ परन्तु न तो मेरे पास इन व्यर्थ की बातों के लिए समय है( पहले ही इस पुस्तक पर अपना काफ़ी अमूल्य समय नष्ट कर चुका हूँ) और न मैं इसे आवश्यक समझता हूँ (उत्तेजित भाषा के प्रयोग के लिए क्षमा करें, परन्तु उन्होंने पुस्तक में इसी प्रकार की ओजपूर्ण भाषा का प्रयोग किया है)। वैसे भी जिस तरह की व्याख्या इस पुस्तक में की गई है, अन्य सभी धर्मों की किताबों की ऐसी व्याख्या से बाजार भरा पड़ा है। एक और बढ़ जाने से कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ता।
अन्त मैं मानस की निम्न पंक्तियों द्वारा मैं विवाद पर पूर्णविराम लगाता हूँ-

हरि हर जस राकेस राहु से । पर अकाज भर सहसबाहु से॥
जे पर दोष लखहिं सहसाखी। परहित घृत जिन्ह के मनमाखी॥

संजय अग्निहोत्री

बेनामी ने कहा…

संजय अग्निहोत्री Ji ko koti koti sadhuvaad

Sanatan dharm ko kuch logo ne apne swarth ke karan badnaam kiya hai . Parantu jis prakaar SURYA ki Kiran malin nahi ho sakti waise hi Sanatan dharm malin nahi ho sakta . Sarv Dharm Sambhav aur vasudev kutumbkam iski aatma hai . Parantu Vinamrata ko kamzori na samjhe yeh sanatan sanskaar hai . Yuva peedi is baat ko aaj nahi toh kal maanegi.

Om Shri Guruve Namah

Shubhaachu -
Amit Pratap Singh

sonuvspandit on 22/8/12 11:34 pm ने कहा…

हिन्दू जाति का उत्थान और पतन सर इसका लिंक दे प्ल्ज़.....

sunil kumar on 11/1/13 5:08 am ने कहा…

please update link

Mahesh Thapa on 8/2/13 10:15 pm ने कहा…

multi mirror link se file download nahi ho raha hai. skip aid pe click karne par iLivid software ka downloading link aata hai (http://lnx.lu/0JRr). bahut sare files download nahi ho raha hai. please suggest how to download files ?

Mahesh
Ktm., Nepal

santosh kamble on 26/6/13 10:50 pm ने कहा…

link pl's...

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