वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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गुरुवार, 21 जुलाई 2011

गहरे पानी पैठ - ओशो


रजनीश चन्द्र मोहन (११ दिसम्बर १९३१ - १९ जनवरी १९९०) ओशो के नाम से प्रख्यात हैं जो अपने विवादास्पद नये धार्मिक (आध्यात्मिक) आन्दोलन के लिये मशहूर हुए और भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका में रहे। रजनीश ने प्रचलित धर्मों की व्याख्या की तथा प्यार, ध्यान और खुशी को जीवन के प्रमुख मूल्य माना।

ओशो ने सैकडों पुस्तकें लिखीं, हजारों प्रवचन दिये। उनके प्रवचन पुस्तकों, आडियो कैसेट तथा विडियो कैसेट के रूप में उपलब्ध हैं। अपने क्रान्तिकारी विचारों से उन्होने लाखों अनुयायी और शिष्य बनाये। अत्यधिक कुशल वक्ता होते हुए इनके प्रवचनों की करीब ६०० पुस्तकें हैंसंभोग से समाधि की ओर इनकी सबसे चर्चित और विवादास्पद पुस्तक है। इनके नाम से कई आश्रम चल रहे है।

प्रस्तुत पुस्तक मंदिर, मूर्तिपूजा, तिलक-टीके, तीर्थ आदि विषयों के आंतरिक विज्ञान के संबंध में ओशो के ऐसे ही अनूठे प्रवचनों का संकलन है।
प्रस्तुत पुस्तक मंदिर, मूर्तिपूजा, तिलक-टीके, तीर्थ आदि विषयों के आंतरिक विज्ञान के संबंध में ओशो के ऐसे ही अनूठे प्रवचनों का संकलन है। साथ ही, इसमें ज्योतिष पर दो प्रवचन भी संकलित हैं। ये सभी प्रवचन देशभर में खूब चर्चित हुए हैं, क्योंकि विश्व के आध्यात्मिक साहित्य में ये सर्वथा दुर्लभ हैं। सरकार को ऐसी पुस्तक को प्रत्येक विद्यालय के पाठ्यक्रम में सम्मिलित कर लेना चाहिए, क्योंकि यह एक शुद्ध वैज्ञानिक पुस्तक है।

पुस्तक का एक अंश:

जैसे हाथ में चाबी हो, चाबी को हम कैसे भी सीधा जानने का उपाय करें, चाबी से ही चाबी को समझना चाहें, तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता उस चाबी की खोज-बीन से, कि कोई बड़ा खजाना उसके हाथ लग सकता है। चाबी में ऐसी कोई भी सूचना नहीं है जिससे छिपे हुए खजाने का पता लगे। चाबी अपने में बिल्कुल बंद है चाबी को हम तोड़ें-फोड़ें, काटें लोहा हाथ लगे, और धातुएं हाथ लग जाएं उस खजाने की कोई खबर हाथ न लगेगी, जो चाबी से मिल सकता है। और जब भी कोई चाबी ऐसी हो जाती है जीवन में, कि जिससे खजानों का हमें पता नहीं लगता है, तब सिवाय बोझ ढोने के हम और कुछ भी नहीं ढोते।

और जिंदगी में ऐसी बहुत-सी चाबियां हैं जो किन्हीं खजानों का द्वार खोलती हैं-आज भी खोल सकती हैं। पर न हमें खजानों का कोई पता है, न उन तालों का हमें कोई पता है जो हमसे खुलेंगे। और जब तालों का भी पता नहीं होता और खजानों का भी पता नहीं होता, तो स्वभावतः हमारे हाथ में जो रह जाता है उसको हम चाबी भी नहीं कह सकते। वह चाबी तभी है जब किसी ताले को खोलती हो। जब उससे, कुछ भी न खुलता हो, पर फिर भी उस चाबी से कभी खजाने खुले हैं इसलिए बोझिल हो जाती हैं; तो भी मन उसे फेंक देने का नहीं होता। कहीं मनुष्य जाति के अचेतन में वह धीमी-सी गंध बनी ही रह जाती है।




यह पुस्तक हमें श्री
योगेन्द्र सिंह शेखावत ने झुंझुनू, राजस्थान से भेजी है जिसके लिए हम उनके आभारी है


फाइल का आकार: ४०० Kb



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6 टिप्पणियां:

raviranjannobel on 21/7/11 6:49 pm ने कहा…

ओशी ने पुस्तकें लिखी नहीं बोली हैं . उन्होंने जो भी प्रवचन दिया वो अब पुस्तक के रूप मे उपलब्ध है.

raviranjannobel on 21/7/11 6:52 pm ने कहा…

हम "श्री योगेन्द्र सिंह शेखावत जी" और "अपनी हिंदी" का आभार प्रकट करते हैं की उन्होंने ओशो के पुस्तक को आम जन के लिए अपनी हिंदी के माध्यम से उपलब्ध कराया . आप सभी को धनवाद .

adarsh000 on 26/7/11 1:06 pm ने कहा…

आपका हार्दिक धन्यवाद जो आपने मेरे गुरु ओशो की पुस्तक उपलब्ध कारवाई । मैं इसके लिए सदैव आपका ऋणी रहूँगा ................. ।
आदर्श ।
कभी मेरे ब्लॉग पर आयें ....
www.adarsh000.blogspot.com

Deepak jaiswal ने कहा…

this is true service of mother language

amarnath ने कहा…

हम "श्री योगेन्द्र सिंह शेखावत जी" और "अपनी हिंदी" का आभार प्रकट करते हैं की उन्होंने ओशो के पुस्तक को अपनी हिंदी के माध्यम से उपलब्ध कराया ओशो विचार धारा है जो की पुराने संस्कार को झकझोड़ देते है और एक नयी राह दिखाते है आपका शुक्रिया जो आप ऐसी वैचारिक क्रान्ति के सहभागी बने है

बेनामी ने कहा…

sabko aisa kam karna chahiya

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