वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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शनिवार, 30 जुलाई 2011

हिंदी की प्रसिद्ध कवितायेँ - एक संग्रह




प्रस्तुत पुस्तक में हिंदी की कुछ प्रसिद्ध कवितायेँ दी गयी है। ये सभी कवितायेँ पढने योग्य है। इस पुस्तक में रहीम से लेकर महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान तक की कवितायेँ,दोहे, सूक्तियां दी गयी है।

सभी कवितायेँ सुंदर है। अवश्य पढ़ें।


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शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

बगुलामुखी स्त्रोत

जो साधक इस बगुलामुखी स्त्रोत का नित्य पाठ करता है, उसके सब कार्य सफल होते हैउसके शत्रुओ का नाश हो जाता हैउसके किसी भी कार्य में कोई बाधा नहीं सकती

देवी बगुलामुखी (माँ पीताम्बरा) इस स्वरुप के आराधना का वर्णन महाभारत और रामायण में मिलता है. अर्जुन ने महाभारत का युद्ध जीतने के लिए जिस स्वरुप की आराधना की थी वह माँ पीताम्बरा ही थी .रावण की वाटिका में जब श्री हनुमान जी के वेग को कोई नहीं रोक पाया था तब मेघनाथ ने जिस ब्रह्मास्त्र का उपयोग कर हनुमान जी को स्तंभित किया था , वह शक्ति देवी बगुलामुखी की ही थी .

सर्व प्रथम बगुलामुखी महाविद्या की साधना ब्रह्मा जी ने की थी . इसके बाद श्री विष्णु जी ने आराधना की थी.एक बार सतयुग में एक विशाल तूफ़ान आया जिसमे सम्पूर्ण सृष्टि को नष्ट कर देने की शक्ति थी. तब भगवन विष्णु ने सौराष्ट्र में हरिद्रा सरोवर के बीच सबकी रक्षा हेतु आराधना की. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माता बगुलामुखी मंगलवार को चतुर्दशी तिथि में अर्ध रात्रि में प्रकट हुई और तूफ़ान को स्तंभित कर विश्व की रक्षा की ।


इनकी साधना अथवा प्रार्थना में आपकी श्रद्धा और विश्वास असीम हो तभी मां की शुभ दृष्टि आप पर पड़ेगी। इनकी आराधना करके आप जीवन में जो चाहें जैसा चाहे वैसा कर सकते हैं। सामान्यत: आजकल इनकी सर्वाधिक आराधना राजनेता लोग चुनाव जीतने और अपने शत्रुओं को परास्त करने में अनुष्ठान स्वरूप करवाते हैं। इनकी आराधना करने वाला शत्रु से कभी परास्त नहीं हो सकता है।

माता की यही आराधना युद्ध, वाद-विवाद मुकदमें में सफलता, शत्रुओं का नाश, मारण, मोहन, उच्चाटन, स्तम्भन, देवस्तम्भन, आकर्षण कलह, शत्रुस्तभन, रोगनाश, कार्यसिद्धि, वशीकरण व्यापार में बाधा निवारण, दुकान बाधना, कोख बाधना, शत्रु वाणी रोधक आदि कार्यों की बाधा दूर करने और बाधा पैदा करने दोनों में की जाती है। साधक अपनी इच्छानुसार माता को प्रसन्न करके इनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है। जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है कि माता श्रद्धा और विश्वास से आराधना (साधना) करने पर अवश्य प्रसन्न होंगी, लेकिन ध्यान रहे इनकी आराधना (अनुष्ठान) करते समय ब्रह्मचर्य परमावश्यक है।


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गुरुवार, 28 जुलाई 2011

अंग्रेजी - हिंदी शब्दकोष (नया)




आप सभी के लिए प्रस्तुत है ये नया अंग्रेजी - हिंदी शब्दकोष (English-Hindi Students Dictionary) । इस अंग्रेज़ी हिन्दी शब्दकोश में आप आसानी से हिन्दी और अंग्रेज़ी शब्दों के अर्थ ढूंढ सकते हैं।

ये शब्दकोष सभी हिंदी प्रेमियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा, ऐसी हमें आशा है। इसमें कुल ३१४ पृष्ठ है और छपाई भी बहुत सुंदर है। PDF फाइल होने से उपयोग करना भी आसान है।


नयी पुस्तक उपलब्ध करवा दी गयी है




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बुधवार, 27 जुलाई 2011

श्री शिव महिमन स्त्रोतम - (संस्कृत)


एक ही तत्व की तीन परम मूर्तियों (ब्रह्मा,विष्णु,शिव) में अन्तिम मूर्ति का नाम ही शिव है,ब्रह्मा का कार्य सृष्टि,विष्णु का स्थिति (पालन) और शिव का कार्य संहार करना है,परन्तु साम्प्रदायक शैवों के अनुसार शिव परम तत्व है,और उनके कार्यों मे संहार के अतिरिक्त सृष्टि और पालन के कार्य भी सम्मिलित है,शिव परम कारुणिक भी है,और उनमे अनुग्रह अथवा प्रसाद तथा तिरो भाव( गोपन और लोपन) की क्रिया भी पायी जाती है,इस प्रकार उनके कार्य पांच प्रकार के हैं,शिव की विभिन्न अभिव्यक्तियां इन्ही कार्यों मे से किसी न किसी से सम्बन्धित हैं,इनका उद्देश्य भक्तों का कल्याण करना है ।

यहां के लेखक नगरों और राजा-महाराजों के दरबारों में नहीं रहते थे। शिव विभिन्न कलाओं और सिद्धियों के प्रवर्तक भी माने गये हैं,संगीत,नृत्य,योग,व्याकरण,व्याख्यान,भैषज्य,आदि के मूल प्रवर्तक शिव ही हैं,इनकी कल्पना सब जीवधारियों के स्वामी के रूप मे की गयी है,इसी लिये यह पशुपति,भूतपति,और भूतनाथ कहे गये है,शिव सभी देवताओं मे श्रेष्ठ कहे गये है,इसी लिये महेश्वर और महादेव इनके विरुद पाये जाते है,इनमे माया की अनन्त शक्ति है,इसी लिये शिव मायापति भी है,उमा के पति होने से शिव का एक पर्याय उमापति भी है,इनके अनेक विरुद और पर्याय है ।

शिवपुराण भी उन्तीस उपपुराणों में एक है,यह भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है।इसमे चौबीस हजार श्लोक है । शिवपुराण 'अपनी हिंदी' पर डाउनलोड किया जा सकता है।




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मंगलवार, 26 जुलाई 2011

भारतवर्ष का इतिहास - प्रो. रामदेव


पश्चाचात्य लेखकों का यह कहना कि भारतवर्ष का प्राचीन इतिहास नहीं मिलता, उनकी अज्ञानता का ही सूचक है। इस अज्ञान का कारण यह है कि जब यूरोपियन लोग भारत में आए तो उनका सम्पर्क भारत के ऐसे लोगों से हुआ जो स्वयं कुछ पढ़े-लिखे नहीं थे। भारत के ब्राह्मण अपनी मूर्खता अथवा संकीर्णता के कारण इन विदेशियों से अपने शास्त्र और ज्ञान को पृथक् रखने का यत्न करते रहे। यहाँ के लोग इन आचारहीन विदेशियों को नीच, अछूत और म्लेच्छ मानते थे। इस कारण उनको ज्ञान के भारतीय ग्रन्थों का परिचय भी नहीं दिया।

यहां के लेखक नगरों और राजा-महाराजों के दरबारों में नहीं रहते थे। इसका एक कारण यह भी था कि भारतवासी इतिहास लिखते तो थे, परन्तु उनके इतिहास लिखने का उद्देश्य वह नहीं था जो कि पाश्चात्य लेखकों का है। यूनान, रोम, मिस्र, फ्रांस, इंग्लैण्ड इत्यादि देशों में वहां के राजा-रईसों, जमींदारों तथा विजेताओं द्वारा इतिहास लिखने के लिए कुछ लोग नियुक्त किए जाते थे। परिणामस्वरूप के इतिहास उन राजा-रईसों की प्रशंसा में और उनकी रुचि अनुसार ही लिखे जाते थे।
भारतवर्ष
में यह प्रथा नहीं थी। यहां के लेखक नगरों और राजा-महाराजों के दरबारों में नहीं रहते थे। वे प्रायः वनों में अपने आश्रमों में रहते और अपना पठन-पाठन का उद्देश्य राजा-महाराजाओं को प्रसन्न करना नहीं वरन् जन-साधारण के ज्ञान की वृद्धि करना होता था। जन-साधारण को इतिहास से क्या शिक्षा लेनी चाहिए, उन्हें यही अभिप्रेत था।
इस कारण भारतीय लेखक केवल ऐतिहासिक घटनाओं को ही लिख देने से संतोष नहीं करते थे। वरन प्रत्येक घटना का कारण और उस घटना से उत्पन्न परिणाम का दर्शन आवश्यक समझा जाता था।


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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य - दादा भगवान

इस पुस्तक में दादाश्री के ब्रह्मचर्य से सम्बंधित प्रवचनों का संकलन है।

'दादा भगवान' कौन हैं?

जो दिखाई देते हैं, वे 'दादा भगवान' नहीं हैं। वे तो 'ए.एम.पटेल' हैं लेकिन भीतर में जो प्रकट हुए हैं, वे 'दादा भगवान' हैं, वे चौदह लोक के नाथ हैं। आपके अंदर (भीतर) भी वही 'दादा भगवान' हैं। फर्क सिर्फ इतना ही है कि 'ज्ञानीपुरुष' के अंदर संपूर्ण व्यक्त, प्रकट हो गए हैं और आपके अंदर व्यक्त नहीं हुए हैं।




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सोमवार, 25 जुलाई 2011

छत्रपति शिवाजी



प्रस्तुत पुस्तक महान इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार ने लिखी है। इसे पढ़कर आपको मराठा साम्राज्य और शिवाजी महाराज के बारे में बहुत सी नई जानकारियां मिलेगी।

छत्रपति शिवाजी राजे भोसले (१६३०-१६८०) ने १६७४ में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी। उसने कई वर्ष औरंगज़ेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया।

शिवाजी महाराज के चरित्र पर माता-पिता का बहुत प्रभाव पड़ा। बचपन से ही वे उस युग के वातावरण और घटनाओँ को भली प्रकार समझने लगे थे। शासक वर्ग की करतूतों पर वे झल्लाते थे और बेचैन हो जाते थे। उनके बाल-हृदय में स्वाधीनता की लौ प्रज्वलित हो गयी थी। उन्होंने कुछ स्वामिभक्त साथियों का संगठन किया। अवस्था बढ़ने के साथ विदेशी शासन की बेड़ियाँ तोड़ फेंकने का उनका संकल्प प्रबलतर होता गया।

यदुनाथ सरकार की अन्य कृतियों में निम्नलिखित उल्लेखनीय हैं -

  • "एनेकडोट्स ऑव औरंगजेब" (1912, तीसरा संशोधित संस्करण, 1949);
  • "चैतन्याज लाइफ़ ऐंड टीचिग्ज़" (1922, मूल लेख 1912),
  • "स्टडीज इन मुगल इंडिया" (1919) "मुगल ऐडमिनिस्ट्रेंशन", (दोनों खंड 1925);
  • "बेगम समरू" (1925);
  • "इंडिया थ्रू दी एजेज़" (1928);
  • "ए शार्ट हिस्टरी ऑव औरंगजेब" (1930);
  • "बिहार ऐंड उड़ीसा ड्यूरिंग द फॉल ऑव द मुगल एंपायर" (1932);
  • "हाउस ऑव शिवाजी" (1940),
  • "मअसिर-ए-आलमगीरी" (अंग्रेजी अनुवाद, 1947);
  • "हिस्टरी ऑव बंगाल" (दूसरा भाग, संपा., 1948);
  • "पूना रेज़ीडेंसी कारेस्पॉन्डेंस" (Poona Residency correspondence) जिल्द 1, 8 व 14 संपादित 1930, 1945, 1949)
  • "आईन-ए-अकबरी" (जैरेट कृत अनुवाद का संशोधित संस्कण, (1948-1950);
  • "देहली अफ़ेयर्स, 1761-1788" (1953); "मिलिटरी हिस्टरी ऑव इंडिया" (1960)।

सरकार ने जयपुर राज्य का इतिहास भी लिखा।



फाइल का आकार: 8 Mb



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शनिवार, 23 जुलाई 2011

वराह पुराण


इस पुराण में भगवान् श्रीहरि के वराह अवतार की मुख्य कथा के साथ अनेक तीर्थ, व्रत, यज्ञ, दान आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसमें भगवान् नारायणका पूजन-विधान, शिव-पार्वती की कथाएँ, वराह क्षेत्रवर्ती आदित्य तीर्थों की महिमा, मोक्षदायिनी नदियों की उत्पत्ति और माहात्म्य एवं त्रिदेवों की महिमा आदि पर भी विशेष प्रकाश डाला गया है।
यह पुराण दो भागों से युक्त है और सनातन भगवान विष्णु के माहात्मय का सूचक है। वाराह पुराण की श्लोक संख्या चौबीस हजार है, इसे सर्वप्रथम प्राचीन काल में वेदव्यास जी ने लिपिबद्ध किया था। इसमें भगवान् श्रीहरिके वराह अवतार की मुख्य कथा के साथ अनेक तीर्थ, व्रत, यज्ञ-यजन, श्राद्ध-तर्पण, दान और अनुष्ठान आदि का शिक्षाप्रद और आत्मकल्याणकारी वर्णन है।
भगवान् श्रीहरि की महिमा, पूजन-विधान, हिमालय की पुत्री के रूप में गौरी की उत्पत्ति का वर्णन और भगवान शंकर के साथ उनके विवाह की रोचक कथा इसमें विस्तार से वर्णित है। इसके अतिरिक्त इसमें वराह-क्षेत्रवर्ती आदित्य-तीर्थों का वर्णन, भगवान श्रीकृष्ण और उनकी लीलाओं के प्रभाव से मथुरामण्डल और व्रज के समस्त तीर्थों की महिमा और उनके प्रभाव का विशद तथा रोचक वर्णन है।



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शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

भूकंप


भूकंप आज भी ऐसा प्रलय माना जाता है जिसे रोकने या काफी समय पहले सूचना देने की कोई प्रणाली वैग्यानिकों के पास नहीं है। प्रकृति के इस तांडव के आगे सभी बेबश हो जाते हैं। सामने होता है तो बस तबाही का ऐसा मंजर जिससे उबरना आसान नहीं होता है।

प्रस्तुत पुस्तक में आप पढेंगे की भूकंप क्यों आते है, क्या इनकी भविष्यवाणी संभव है, भारत में आये प्रमुख भूकंप कौन से है इत्यादि। पुस्तक पढ़कर आपको भूकंप के बारे में काफी जानकारी मिलेगी।


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गुरुवार, 21 जुलाई 2011

गहरे पानी पैठ - ओशो


रजनीश चन्द्र मोहन (११ दिसम्बर १९३१ - १९ जनवरी १९९०) ओशो के नाम से प्रख्यात हैं जो अपने विवादास्पद नये धार्मिक (आध्यात्मिक) आन्दोलन के लिये मशहूर हुए और भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका में रहे। रजनीश ने प्रचलित धर्मों की व्याख्या की तथा प्यार, ध्यान और खुशी को जीवन के प्रमुख मूल्य माना।

ओशो ने सैकडों पुस्तकें लिखीं, हजारों प्रवचन दिये। उनके प्रवचन पुस्तकों, आडियो कैसेट तथा विडियो कैसेट के रूप में उपलब्ध हैं। अपने क्रान्तिकारी विचारों से उन्होने लाखों अनुयायी और शिष्य बनाये। अत्यधिक कुशल वक्ता होते हुए इनके प्रवचनों की करीब ६०० पुस्तकें हैंसंभोग से समाधि की ओर इनकी सबसे चर्चित और विवादास्पद पुस्तक है। इनके नाम से कई आश्रम चल रहे है।

प्रस्तुत पुस्तक मंदिर, मूर्तिपूजा, तिलक-टीके, तीर्थ आदि विषयों के आंतरिक विज्ञान के संबंध में ओशो के ऐसे ही अनूठे प्रवचनों का संकलन है।
प्रस्तुत पुस्तक मंदिर, मूर्तिपूजा, तिलक-टीके, तीर्थ आदि विषयों के आंतरिक विज्ञान के संबंध में ओशो के ऐसे ही अनूठे प्रवचनों का संकलन है। साथ ही, इसमें ज्योतिष पर दो प्रवचन भी संकलित हैं। ये सभी प्रवचन देशभर में खूब चर्चित हुए हैं, क्योंकि विश्व के आध्यात्मिक साहित्य में ये सर्वथा दुर्लभ हैं। सरकार को ऐसी पुस्तक को प्रत्येक विद्यालय के पाठ्यक्रम में सम्मिलित कर लेना चाहिए, क्योंकि यह एक शुद्ध वैज्ञानिक पुस्तक है।

पुस्तक का एक अंश:

जैसे हाथ में चाबी हो, चाबी को हम कैसे भी सीधा जानने का उपाय करें, चाबी से ही चाबी को समझना चाहें, तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता उस चाबी की खोज-बीन से, कि कोई बड़ा खजाना उसके हाथ लग सकता है। चाबी में ऐसी कोई भी सूचना नहीं है जिससे छिपे हुए खजाने का पता लगे। चाबी अपने में बिल्कुल बंद है चाबी को हम तोड़ें-फोड़ें, काटें लोहा हाथ लगे, और धातुएं हाथ लग जाएं उस खजाने की कोई खबर हाथ न लगेगी, जो चाबी से मिल सकता है। और जब भी कोई चाबी ऐसी हो जाती है जीवन में, कि जिससे खजानों का हमें पता नहीं लगता है, तब सिवाय बोझ ढोने के हम और कुछ भी नहीं ढोते।

और जिंदगी में ऐसी बहुत-सी चाबियां हैं जो किन्हीं खजानों का द्वार खोलती हैं-आज भी खोल सकती हैं। पर न हमें खजानों का कोई पता है, न उन तालों का हमें कोई पता है जो हमसे खुलेंगे। और जब तालों का भी पता नहीं होता और खजानों का भी पता नहीं होता, तो स्वभावतः हमारे हाथ में जो रह जाता है उसको हम चाबी भी नहीं कह सकते। वह चाबी तभी है जब किसी ताले को खोलती हो। जब उससे, कुछ भी न खुलता हो, पर फिर भी उस चाबी से कभी खजाने खुले हैं इसलिए बोझिल हो जाती हैं; तो भी मन उसे फेंक देने का नहीं होता। कहीं मनुष्य जाति के अचेतन में वह धीमी-सी गंध बनी ही रह जाती है।




यह पुस्तक हमें श्री
योगेन्द्र सिंह शेखावत ने झुंझुनू, राजस्थान से भेजी है जिसके लिए हम उनके आभारी है


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बुधवार, 20 जुलाई 2011

संपादक की कलम से - जरूरी सूचना

प्रिय पाठकों,


पिछले कुछ महीनो से आपने लगातार जो प्रेम और स्नेह 'अपनी हिंदी' को प्रदान किया है, उसके लिए हम आपके आभारी है। आज हर एक हिंदी प्रेमी के दिल में 'अपनी हिंदी' ने जगह बना ली है . आपके सहयोग के बिना ऐसा हो पाना कतई मुमकिन नहीं था । लेकिन इसके साथ ही 'अपनी हिंदी' को और बेहतर बनाने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।

पिछले कई दिनों से हम इन विषयों के बारे में जानकारी देने की सोच रहे थे इसलिए आपसे कुछ विषयों पर बात करना चाहते है और कुछ सूचना, कुछ निर्देश देना चाहते है जो कि निम्न प्रकार से है:

(इन निर्देशों का मकसद किसी प्रकार की पाबंदिया लागू करना नहीं है, बल्कि 'अपनी हिंदी' को और बेहतर बनाना है।)

1. फरमायश करते समय कृपया ध्यान रखें :

(A) कृपया फरमायश करते समय अपना नाम, पता जरूर दें इसमें किसी तरह से डरने या घबराने या अपना नाम छुपाने की जरूरत नहीं है' अपनी हिंदी' आपका अपना मंच हैखुले दिल से मांग भी करें और इसमें योगदान भी करें'बेनामी' और अधूरी फरमायश पर गौर नहीं किया जायेगा


(B) कृपया फरमायश करने के लिए सही जगह का प्रयोग करें इसके लिए ऊपर खास तौर से तैयार किया गया
'आपकी फरमायश' लिंक दिया गया है। इसी में अपनी फरमायश दें। अन्यत्र की गयी फरमायश पर हम गौर नहीं करतेकरते भी है तो बहुत देर में करते है

(C) फरमायश करते समय पुस्तक, लेखक, प्रकाशक के बारे में अधिक से अधिक जानकारी देने का प्रयास करें ताकि पुस्तक को खोजने में आसानी हो सकें।


(D) फरमायश करते समय शिष्ट भाषा का प्रयोग करें
हमारे पास कई बार ई-मेल आती है जिनमे लिखा होता है -

give me this book

या लिखा होता है -
email me this book. I urgently need this.

ना तो खुद के बारे में कोई जानकारी दी होती है, ना ही पुस्तक के बारे में ।

हम -मेल के द्वारा कोई भी पुस्तक नहीं भेजते हैहमारी पुस्तके पुरे समुदाय के लिए है, किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहींऔर फिर ऐसा करना व्यावहारिक रूप से संभव भी नहीं है।

जो भी पुस्तक प्रकाशित की जाती है, पूरी दुनिया के पाठकों के लिए एक साथ 'अपनी हिंदी' पर प्रकाशित की जाती हैइसलिए कृपया इस तरह का अनुरोध ना करें

(E) किसी पुस्तक की फरमायश करने से पहले 'अपनी हिंदी' पर उस पुस्तक को ढूंढेहमारे पास कई ऐसी पुस्तकों की फरमायश आती है जो पहले से यहाँ उपलब्ध है। इसका उदहारण आप 'आपकी फरमायश' के अंतर्गत देख सकते है।

उदहारण के लिए चंद्रकांता एक ऐसी पुस्तक है जो हमने सबसे पहले इस साईट पर उपलब्ध करवाई थी लेकिन हमें अब तक उसकी फरमायश मिलती रहती है।

और हाँ, सर्च करते समय 'हिंदी भाषा' का प्रयोग करें । अगर आपको हिंदी में टाइप करना नहीं आता तो आप गूगल की इस वेबसाइट पर हिंदी में टाइप कर सकते है और उसे copy करके 'अपनी हिंदी' के search box में Paste करके सर्च कर सकते है जो की दायीं तरफ मेनू के नीचे दिया गया है।

इस वेबसाइट का पता है:
http://www.google.com/transliterate/


(2.) उन सभी पाठकों का बहुत बहुत धन्यवाद् जो हमारे पास पुस्तके भेज रहे है.
कृपया ध्यान रखें, अगर आप कोई पुस्तक हमारे पास भेज रहे है तो उसके बारे में आपको जो भी जानकारी उपलब्ध हो, उसे भी हमारे पास भेजने की कृपा करें। इससे हमें काफी आसानी रहेगी।

(.) कृपया 'अपनी हिंदी' को और बेहतर बनाने के लिए हमें अपने सुझाव दें तथा इसे और बेहतर बनाने में अपना योगदान दें। आप अपने सुझाव/कमेंट्स इसी पोस्ट के नीचे दे सकते है ।


(4.) 'अपनी हिंदी' आपका अपना मंच है हम भी आप ही की तरह इसमें योगदान कर रहे है। ये एक पूर्णतया निशुल्क माध्यम है हिंदी भाषा को आगे बढ़ाने का और हिंदी साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने का । बल्कि हम तो अपने आपको किसी ऐसे NGO से कम नहीं मानते जो देश-सेवा का कोई काम कर रहा हो। आखिर 'हिंदी' भाषा की सेवा भी 'हिंदुस्तान' की सेवा ही तो है।

कृपया 'अपनी हिंदी' के बारे में अपने मित्रो-परिचितों को भी बताएं ताकि वे भी इसका लाभ उठा सकेंविदेशों में तो लोग पुस्तकें खरीद-खरीद कर अपने मित्रो-परिचितों को भेंट में देते हैआप बिना कोई शुल्क अदा किये ही ये काम कर सकते है

(5) अगर आपके पास कोई हिंदी पुस्तक उपलब्ध हो तो उसे स्कैन करके अपनी हिंदी को ईमेल करें। इसके लिए ऊपर Submit A Book नाम से लिंक दिया हुआ है जिसमे आपको सभी जानकारी मिल जाएगी।

(6.) पुस्तक डाउनलोड करने में कोई समस्या हो तो पहले यहाँ क्लिक करें। अगर फिर भी समस्या ना सुलझे तो उसे सम्बंधित फाइल की पोस्ट के नीचे कमेन्ट के रूप में हमें बताएं।

(7.) अगर किसी फाइल को खोलने के लिए पासवर्ड की जरूरत पड़े तो hindilove आजमा कर देखें। अधिकतर फाइल बिना पासवर्ड के ही है




अगले
कुछ दिनों में हम आपको लगातार ऐसी पुस्तकें उपलब्ध करवाएंगे जिनका अभी तक आपने सिर्फ नाम सुना होगा (या शायद वो भी नहीं सुना होगा)। जिन्हें पढने की तो आपने कभी उम्मीद भी नहीं की होगी । हिंदी भाषा के कुछ अनमोल रत्न आपको उपलब्ध होंगे सिर्फ 'अपनी हिंदी' पर


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जय हिंदी, जय भारत
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मंगलवार, 19 जुलाई 2011

कूर्म पुराण



महापुराणों की सूची में पंद्रहवें पुराण के रूप में परिगणित कूर्म पुराण का विशेष महत्त्व है। सर्वप्रथम भगवान् विष्णुने कूर्म अवतार धारण करके इस पुराण को राजा इन्द्रद्युम्न को सुनाया था, पुनः भगावन् कूर्म ने उसी कथानक को समुद्र-मन्थन के समय इन्द्रादि देवताओं तथा नारदादि ऋषिगणों से कहा। तीसरी बार नैमिषारण्यके द्वादशवर्षीय महासत्रके अवसर पर रोमहर्षण सूत के द्वारा इस पवित्र पुराण को सुनने का सैभाग्य अट्ठासी हजार ऋषियों को प्राप्त हुआ। भगवान् कूर्म द्वारा कथित होने के कारण ही इस पुराण का नाम कूर्म पुराण विख्यात हुआ।सत्रह श्लोकों का यह पुराण विष्णु जी ने कूर्म अवतार से राजा इन्द्रद्युम्न को दिया था। इसमें विष्णु और शिव की अभिन्नता कही गयी है। पार्वती के आठ सहस्र नाम भी कहे गये हैं। काशी व प्रयाग क्षेत्र का महात्म्य, ईश्वर गीता, व्यास गीता आदि भी इसमें समाविष्ट हैं। यद्यपि कूर्म पुराण एक वैष्णव प्रधान पुराण है, तथापि इसमें शैव तथा शाक्त मत की भी विस्तृत चर्चा की गई है। इस पुराण में पुराणों में पांचों प्रमुख लक्षणों-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर एवं वंशानुचरित का क्रमबद्ध तथा विस्तृत विवेचन किया गया है।





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सोमवार, 18 जुलाई 2011

गरूड़ पुराण



गरूड़ पुराण वैष्णव सम्प्रदाय से सम्बन्धित है और सनातन धर्म में मृत्यु के बाद सद्गति प्रदान करने वाला माना जाता है। इसलिये सनातन हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद गरुड़ पुराण के श्रवण का प्रावधान है। इस पुराणके अधिष्ठातृ देव भगवान् विष्णु हैं। इसमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार, निष्काम कर्म की महिमा के साथ यज्ञ, दान, तप तीर्थ आदि शुभ कर्मों में सर्व साधारणको प्रवृत्त करने के लिये अनेक लौकिक और पारलौकिक फलोंका वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें आयुर्वेद, नीतिसार आदि विषयोंके वर्णनके साथ मृत जीव के अन्तिम समय में किये जाने वाले कृत्यों का विस्तार से निरूपण किया गया है। आत्मज्ञान का विवेचन भी इसका मुख्य विषय है।
'गरूड़ पुराण' में उन्नीस हजार श्लोक कहे जाते हैं, किन्तु वर्तमान समय में कुल सात हजार श्लोक ही उपलब्ध हैं।
अठारह पुराणों में गरुड़महापुराण का अपना एक विशेष महत्व है। इसके अधिष्ठातृदेव भगवान् विष्णु है। अतः यह वैष्णव पुराण है। गरूड़ पुराण में विष्णु-भक्ति का विस्तार से वर्णन है। भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों का वर्णन ठीक उसी प्रकार यहां प्राप्त होता है, जिस प्रकार 'श्रीमद्भागवत' में उपलब्ध होता है। आरम्भ में मनु से सृष्टि की उत्पत्ति, ध्रुव चरित्र और बारह आदित्यों की कथा प्राप्त होती है। उसके उपरान्त सूर्य और चन्द्र ग्रहों के मंत्र, शिव-पार्वती मंत्र, इन्द्र से सम्बन्धित मंत्र, सरस्वती के मंत्र और नौ शक्तियों के विषय में विस्तार से बताया गया है। इसके अतिरिक्त इस पुराण में श्राद्ध-तर्पण, मुक्ति के उपायों तथा जीव की गति का विस्तृत वर्णन मिलता है।




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शनिवार, 16 जुलाई 2011

अमृतवाणी


'अमृतवाणी' आप सभी ने सुनी होगी, पढ़ी होगी . आज हम ये अमृतवाणी आप सब के लिए प्रस्तुत कर रहे है
इसके रचयिता श्री सत्यानंद जी महाराज है। यह बहुत ही उत्तम रचना है.

अवश्य पढ़ें .

परम पूज्य श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज की 150 वीं जयन्ती 18 अप्रैल 2011 को थी . स्वामी जी महाराज का जन्म सन 1861 की चैत्र शुक्ल पूरणमासी के दिन प्रात: 5 बजे हुआ था.




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शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

श्री साईं रक्षा कवच

कैसी भी आपद-विपदा हो, “ श्री साईं रक्षा कवच” का पाठ करें, साईं अच्छा ही करेंगे इससे चमत्कारी रक्षा कवच और कोई हो ही नहीं सकता ।

साईं बाबा (२८ सितंबर, १८३५– १५ अक्तूबर, १९१८), एक भारतीय संत एवं गुरू हैं जिनका जीवन शिरडी में बीता। उन्होंने लोक कल्याणकारी कार्यों को किया तथा जनता में भक्ति एवं धर्म की धारा बहाई। इनके अनुयायी भारत के सभी प्रांतों में हैं एवं इनकी मृत्यु के लगभग ९० वर्षों के बाद आज भी इनके चमत्कारों को सुना जाता है।
इसलिए अगर मुक्त होना चाहते हो, सबसे पहले स्वयं को आडम्बरो से छुटकारा पाना होगा।

साई बाबा सर्व समर्थ हो कर भी हमेशा अपना जीवन सीमित साधनों द्वारा ही व्यतीत किए और सभी जनमानस को सादगी एवं सरल जीवन व्यतीत करना सिखाएं। क्योकि सरलता पूर्वक ही इस संसार मे प्रभु को प्राप्त किया जा सकता है। सांई हमेशा ही आडम्बरो से मुक्त रह कर यह बताते थे कि आडम्बरो मे ही अहंकार की भवना निहित होती है। इसलिए अगर मुक्त होना चाहते हो, सबसे पहले स्वयं को आडम्बरो से छुटकारा पाना होगा।

सांई बाबा जो हमेशा ही यही कोशिश करते रहें की जनमानस क ह्रदयपटल मे से समाज मे व्याप्त सामाजिक कुरितीयों का नाश हो और सभी प्रेम पूर्वक रह कर जीवन का आनंद ले क्योंकि हमारे भारतवर्ष में कितने ही धर्म जाति के लोग व उनके समुदाय बसे हुए हैं।और सभी अपने धर्म को श्रेष्ट बताते हुए आपस मे मतभेद रखते हैं। और जिसका परिणाम सिवाय समाजिक अराजकता और दन्गे के रुप मे सामने आते है। इसिलिए बाबा ने हमेशा ही यह कह कर की "सबका मालिक एक" गुरुमंत्र दिया है।



फाइल का आकार: 130 Kb

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