वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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गुरुवार, 2 जून 2011

पुलिस और हमारे अधिकार









'पुलिस और हमारे अधिकार' एक बहुत ही उपयोगी पुस्तक हैइसमें बताया गया है कि अगर हमें कभी पुलिस से कोई काम पड़ जाये तो हमारे अधिकार क्या-क्या है और हम उन अधिकारों का किस तरह से इस्तेमाल कर सकते है

यह पुस्तक सभी पाठकों के लिए उपयोगी हैहर पाठक को इसे अवश्य पढना चाहिएयह हमारे जीवन में काम आने वाली पुस्तक है

नोट: पुस्तक की स्केंनिंग उच्च स्तर की नहीं है, इसके लिए हमें खेद है।

फाइल का आकार: १ Mb


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4 टिप्पणियां:

प्रवीण पाण्डेय on 2/6/11 7:34 pm ने कहा…

ये चित्र देखकर तो नहीं लगता है।

Kajal Kumar on 5/6/11 8:12 pm ने कहा…

स्कैनिंग निश्चय ही अच्छे से पढ़ी जा सकती है. धन्यवाद.

ABHILASA on 7/6/11 2:12 pm ने कहा…

अच्छी जानकारी .

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" on 13/6/11 7:34 pm ने कहा…

लीगल सैल से मिले वकील की मैंने अपनी शिकायत उच्चस्तर के अधिकारीयों के पास भेज तो दी हैं. अब बस देखना हैं कि-वो खुद कितने बड़े ईमानदार है और अब मेरी शिकायत उनकी ईमानदारी पर ही एक प्रश्नचिन्ह है

मैंने दिल्ली पुलिस के कमिश्नर श्री बी.के. गुप्ता जी को एक पत्र कल ही लिखकर भेजा है कि-दोषी को सजा हो और निर्दोष शोषित न हो. दिल्ली पुलिस विभाग में फैली अव्यवस्था मैं सुधार करें

कदम-कदम पर भ्रष्टाचार ने अब मेरी जीने की इच्छा खत्म कर दी है.. माननीय राष्ट्रपति जी मुझे इच्छा मृत्यु प्रदान करके कृतार्थ करें मैंने जो भी कदम उठाया है. वो सब मज़बूरी मैं लिया गया निर्णय है. हो सकता कुछ लोगों को यह पसंद न आये लेकिन जिस पर बीत रही होती हैं उसको ही पता होता है कि किस पीड़ा से गुजर रहा है.

मेरी पत्नी और सुसराल वालों ने महिलाओं के हितों के लिए बनाये कानूनों का दुरपयोग करते हुए मेरे ऊपर फर्जी केस दर्ज करवा दिए..मैंने पत्नी की जो मानसिक यातनाएं भुगती हैं थोड़ी बहुत पूंजी अपने कार्यों के माध्यम जमा की थी.सभी कार्य बंद होने के, बिमारियों की दवाइयों में और केसों की भागदौड़ में खर्च होने के कारण आज स्थिति यह है कि-पत्रकार हूँ इसलिए भीख भी नहीं मांग सकता हूँ और अपना ज़मीर व ईमान बेच नहीं सकता हूँ.

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