वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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मंगलवार, 31 मई 2011

दया बाई की बानी


संत दया बाई, संत चरणदास की शिष्या थीं। दो बहनें थीं- सहजो बाई और दया बाई। दोनों चरणदास को गुरु मानती थीं। इनके बारे में केवल इतना पता चलता है कि ये मेवात (राजस्थान) की रहने वाली थीं और जाति की वैश्य थीं। लेकिन संत साहित्य में इन दोनों बहनों का योगदान बड़े आदर से स्वीकार किया गया है।

दया बाई की भक्ति में वैराग्य की प्रधानता थी। उनका कहना था कि वैराग्य को ही अपना सर्वस्व समर्पण करके, हम प्रभु की निकटता पा सकते हैं। वह दीनभाव से वैराग्य के माध्यम से, प्रभु से प्रार्थना करती हैं:
पैरत थाको हे प्रभू सूझत वार न पार। मिहर मौज जब ही करो, तब पाऊं दरबार।।
निरपच्छी के पच्छ तुम, निराधार के धार।
मेरे तुम ही नाथ इक जीवन प्रान अधार।।

दया बाई ने संत चरणदास को अपना गुरु माना था।
वह कहती हैं :
चरणदास गुरुदेव जू ब्रह्म रूप सुख धाम।
ताप हरन सब सुख करन, ‘दयाकरत परनाम।।

संत चरणदास ने अपनी भक्ति में प्रेम को बहुत महत्व दिया। यही कारण था कि दया और सहजो की भक्ति का आधार प्रेम तो था, किन्तु दोनों के मार्ग अलग थे। सहजो ने प्रेमविह्वल प्रभु-स्मरण को स्वीकार किया तो दया ने सर्वस्व समर्पण वैराग्य को। दया ने कहा कि पाप कर्म मत करो, क्योंकि वह ईश्वर से छिपा नहीं रहता। संयम, साधना, तीरथ, व्रत, दान आदि में कुछ नहीं रखा। मां के भरोसे जिस तरह बालक रहता है, वैसे ही प्रभु को समर्पित करो और उसी के भरोसे से रहो।
दया बाई ने कहा- हे प्रभु, मैं तुम्हारे सिवा किसी को नहीं जानती। यह सिर तुम्हारे ही सामने झुकता है। तुम से ही दीन होकर भिक्षा मांगती हूं, तुमसे ही झगड़ा करती हूं। तुम्हारे चरणों की ही तो आश्रित हूं :
सीस नवै तो तुमहिं कूं तुमहीं सूं भाखूं दीन। जो झगरूं तो तुमहिं सूं, तुम चरनन आधीन।।


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सोमवार, 30 मई 2011

संध्या प्रयोग



प्रस्तुत पुस्तक में श्री किशोरीलाल गोस्वामी ने संध्या पूजा करने की विधि और मंत्र बताये है।

मनुष्य द्वारा की गई प्रात:काल, मध्यान्ह काल तथा सायंकाल की पूजा को संध्या कहा जाता है। दिन और रात्रि की सन्घि वेला में पूजा की जाने से इस धार्मिक क्रिया को संध्या कहा है। क्योंकि इसी समय हम ईश्वर के सबसे अधिक निकट होते है . मध्यान्ह को भी सन्घि माना जाता है।

इन तीनों संध्याओं में जो उपासना की जाती है उसे त्रिकाल संध्या कहते हैं। याज्ञवल्क्य ने संध्या का लक्षण बताया है इसमें ऋ क, साम, यजु तीनों वेदों और ब्रह्मा, विष्णु, शिव तीन मूर्तियों का समागम होता है। सभी देवताओं की इसमें सन्घि होती है इसलिए संध्या नाम से प्रसिद्ध है।

वेद व्यास ने तीनों काल की संध्याओं के नाम बताए हैं- पूर्वाह्न में गायत्री, मध्यान्ह में सावित्री तथा सायंकाल में सरस्वती। तैत्तिरीय ब्राह्मण में कहा है कि उगते, अस्त होते तथा मध्यान्ह में ऊपर जाते आदित्य यानी सूर्य का ध्यान करते हुए विद्वान मनुष्य सम्पूर्ण कल्याण को प्राप्त होता है।


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बुधवार, 18 मई 2011

सहजो बाई की बानी




'सहजो बाई की बानी ' में परम संत सहजो बाई की बनिया दी गयी है।

चरन दास की दो शिष्‍यायें थी। एक थी सहजो बाई और दुसरी थी दया बाई। ये चरन दास की दो आंखें है। जैसे किसी पाखी के दो पंख हो। इन दोनों ने चरण दास के गीत गाए है। तब लोगो को चरन दास की खबर लगी।

इन दोनों के स्‍वर इतने एक है कह आप दोनों में भेद नहीं कर पाओगे। एक होंगे ही क्‍योंकि एक ही गुरु ने दोनों को बचाया है। एक ही गुरु की छाया दोनों पर पड़ी ही। एक ही गुरु का ह्रदय दोनों में धड़क रहा है। एक ही प्रेम की रस धारा दोनों में प्रवाहित हो रही है। उसी उर्जा ने जीवन नये आयाम दिये उस बगिया को महकाया है। फूल खिला ये हे। भँवरों न गुंजान की है, रौनक दी ही।


सहजो का एक-एक पद अनूठा है। शब्‍दों के बीच में खाली जगह को पढ़ना पड़ेगा। पंक्‍तियों के बीच में रिक्‍त स्‍थान को पढ़ना पड़ेगा। वो जो खाली जगह है वह पर्याप्त प्रणाम है। बुद्धत्‍व के वचनों का। लेकिन सहजो के वचनों में खाली जगह का तुम नहीं पढ़ सकोगे। उस के लिए तुम्‍हें अपने अन्‍दर की खाली जगह को पढ़ना आना चाहिए। जिस दिन कोई अपने भीतर की खाली जगह को पढ़ लेता है उसी दिन वह बहार के शब्‍दों की खाली जगह को पढ़ सकता है लिख सकता है।
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सोमवार, 16 मई 2011

हीराबाई - ऐतिहासिक उपन्यास





'हीराबाई' पुस्तक किशोरी लाल गोस्वामी जी की रचना है। यह एक ऐतिहासिक उपन्यास है।

कालक्रम की दृष्टि से श्रीनिवासदास के पश्चात् हिन्दी उपन्यास क्षेत्र में किशोरीलाल गोस्वामी का स्थान है। श्रीनिवासदास ने नई चाल की पुस्तक लिखकर जिस विधा का श्रीगणेश किया था; किशोरीलाल गोस्वामी ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति उसी पर केन्द्रित कर दी थी। अपने उपन्यासों की भूमिकाओं में उन्होंने अपनी कुछ मान्यताओं को प्रकट किया है।

अपने समकालीन उपन्यासकारों की अपेक्षा, किशोरीलाल गोस्वामी के उपन्यासों में सामाजिक तत्त्व का आधिक्य है। वे तिलस्मी-ऐयारी, जासूसी-डकैती उपन्यासों से सम्बद्ध नहीं है; किन्तु घटना वैचित्र्य द्वारा रस-उत्पादन-हेतु उन्होंने भी सामाजिक जीवन का वही पक्ष ग्रहण किया है, जो कथा रस से पाठक के हृदय को जासूसी ऐयारी उपन्यासों के ही समान सम्मोहित करे। अतः यह आवश्यक था कि समाज के उस भ्रष्ट वर्ग का चित्रण किया जाता, जिसमें तथाकथित रस से पूर्ण घटना वैचित्र्य का बाहुल्य था।


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शनिवार, 14 मई 2011

देवी अहिल्याबाई


अपने बेटे के अत्याचारों को देखकर एक दिन महारानी का खून खौल उठा । उसने आदेश दिया - 'इसे हाथी के पैरों से कुचलवा डालो ' जन-हित के लिए अपने बेटे को मरवा डालने वाली यह माँ थी - इंदौर के होलकर राज्य की देवी - अहिल्याबाई।

अहिल्याबाई किसी बड़े भारी राज्य की रानी नहीं थीं। उनका कार्यक्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित था। फिर भी उन्होंने जो कुछ किया, उससे आश्चर्य होता है।

अहिल्याबाई ने अपने राज्य की सीमाओं के बाहर भारत-भर के प्रसिद्ध तीर्थों और स्थानों में मंदिर बनवाए, घाट बँधवाए, कुओं और बावड़ियों का निर्माण किया, मार्ग बनवाए-सुधरवाए, भूखों के लिए अन्नसत्र (अन्यक्षेत्र) खोले, प्यासों के लिए प्याऊ बिठलाईं, मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति शास्त्रों के मनन-चिंतन और प्रवचन हेतु की। और, आत्म-प्रतिष्ठा के झूठे मोह का त्याग करके सदा न्याय करने का प्रयत्न करती रहीं-मरते दम तक ।

ये उसी परंपरा में थीं जिसमें उनके समकालीन पूना के न्यायाधीश रामशास्त्री थे और उनके पीछे झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई हुई। अपने जीवनकाल में ही इन्हें जनता ‘देवी’ समझने और कहने लगी थी । इतना बड़ा व्यक्तित्व जनता ने अपनी आँखों देखा ही कहाँ था। जब चारों ओर गड़बड़ मची हुई थी। शासन और व्यवस्था के नाम पर घोर अत्याचार हो रहे थे। प्रजाजन-साधारण गृहस्थ, किसान मजदूर-अत्यंत हीन अवस्था में सिसक रहे थे। उनका एकमात्र सहारा-धर्म-अंधविश्वासों, भय त्रासों और रूढि़यों की जकड़ में कसा जा रहा था। न्याय में न शक्ति रही थी, न विश्वास। ऐसे काल की उन विकट परिस्थितियों में अहिल्याबाई ने जो कुछ किया-और बहुत किया ।-वह चिरस्मरणीय है।

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मंगलवार, 10 मई 2011

भारतीय संत


'भारतीय संत' पुस्तक में भारत के महान संतो का वर्णन किया गया है। इसमें 'नामदेव' , 'संत कबीर', 'गुरु नानक' , 'रैदास', 'मल्कूदास' इत्यादि महान संतो का जीवन चरित दिया गया है। पुस्तक काफी रोचक है। जहाँ पाठकों को इन महान संतो के बारे में जानकारी मिलेगी, वही उनके चरित्र का भी विकास होगा।

यह पुस्तक सभी पाठकों को अवश्य पढनी चाहिए।

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रविवार, 8 मई 2011

बसंत-बहार



'बसंत-बहार' पुस्तक किशोरी लाल गोस्वामी जी की रचना है। इसमें उन्होंने बसंत ऋतू के गीतों का वर्णन किया है।

कालक्रम की दृष्टि से श्रीनिवासदास के पश्चात् हिन्दी उपन्यास क्षेत्र में किशोरीलाल गोस्वामी का स्थान है। श्रीनिवासदास ने नई चाल की पुस्तक लिखकर जिस विधा का श्रीगणेश किया था; किशोरीलाल गोस्वामी ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति उसी पर केन्द्रित कर दी थी। अपने उपन्यासों की भूमिकाओं में उन्होंने अपनी कुछ मान्यताओं को प्रकट किया है।

अपने समकालीन उपन्यासकारों की अपेक्षा, किशोरीलाल गोस्वामी के उपन्यासों में सामाजिक तत्त्व का आधिक्य है। वे तिलस्मी-ऐयारी, जासूसी-डकैती उपन्यासों से सम्बद्ध नहीं है; किन्तु घटना वैचित्र्य द्वारा रस-उत्पादन-हेतु उन्होंने भी सामाजिक जीवन का वही पक्ष ग्रहण किया है, जो कथा रस से पाठक के हृदय को जासूसी ऐयारी उपन्यासों के ही समान सम्मोहित करे। अतः यह आवश्यक था कि समाज के उस भ्रष्ट वर्ग का चित्रण किया जाता, जिसमें तथाकथित रस से पूर्ण घटना वैचित्र्य का बाहुल्य था।


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शुक्रवार, 6 मई 2011

मरणोत्तर जीवन







'मरणोत्तर जीवन ' स्वामी विवेकानंद की एक चर्चित पुस्तक है । इसमें स्वामी जी ने पुनर्जनम पर हिन्दू और पाश्चात्य मत की व्याख्या बड़े सुंदर ढंग से की है।

स्वामी विवेकानन्द (१२ जनवरी,१८६३- ४ जुलाई,१९०२) वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक उन्राजनाम थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् १८९३ में आयोजित विश्व धर्म महासम्मेलन में सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा।अत्यन्त गरीबी में भी नरेन्द्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते । उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। रामकृष्ण जी बचपन से ही एक पहुँचे हुए सिद्ध पुरुष थे। स्वामीजी ने कहा था की जो व्यक्ति पवित्र ढँग से जीवन निर्वाह करता है उसी के लिये अच्छी एकाग्रता प्राप्त करना सम्भव है!


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बुधवार, 4 मई 2011

ईशदूत ईसा



'ईशदूत ईसा ' स्वामी विवेकानंद की एक चर्चित पुस्तक है । इसमें स्वामी जी ने महात्मा ईशा के जीवन चरित्र की व्याख्या बड़े सुंदर ढंग से की है।

स्वामी विवेकानन्द (१२ जनवरी,१८६३- ४ जुलाई,१९०२) वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् १८९३ में आयोजित विश्व धर्म महासम्मेलन में सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा।अत्यन्त गरीबी में भी नरेन्द्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते । उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। रामकृष्ण जी बचपन से ही एक पहुँचे हुए सिद्ध पुरुष थे। स्वामीजी ने कहा था की जो व्यक्ति पवित्र ढँग से जीवन निर्वाह करता है उसी के लिये अच्छी एकाग्रता प्राप्त करना सम्भव है!


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