वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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शनिवार, 30 अप्रैल 2011

मेरा मरना - मणिका मोहिनी


'मेरा मरना' मणिका मोहिनी का कविता संग्रह है। मणिका मोहिनी एक प्रसिद्ध कहानीकार और कवयित्री रही है ।
मणिका मोहिनी की अकविता दौर की कवितायेँ १९९२-९३ में संग्रहित हुई ।

मणिका मोहनी जी ने कहानियों को कैसेट में डाला, खुद लेखक से पढ़वाया। महानगर की कहानियाँ भी उसी समय सामने आयीं। विदेशी पूँजी के हितों के अनुरूप हमारी योजनाएँ बनीं। बडे उद्योग शहरों में लगने से लोग शहरों में सिमटते गये। शहरों में यातायात, आवास और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ बढती गईं - शहर का जीवन यातना का पर्याय बन गया। मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली, चेन्नई जैसे महानगरों को लेकर खूब कहानियाँ लिखी गईं। सूरज प्रकाश, ब्रह्मदत्त, मणिका मोहिनी, महावीर अधिकारी, शैलेन्द्र तिवारी आदि ने मुम्बई के जीवन को लेकर कहानियाँ लिखीं।

मणिका मोहनी जी ने कहानियों को कैसेट में डाला, खुद लेखक से पढ़वाया।

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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

मेरा जीवन तथा ध्येय - स्वामी विवेकानंद


'मेरा जीवन तथा ध्येय' स्वामी विवेकानंद की लिखी हुई एक चर्चित पुस्तक है।

‘मेरा जीवन तथा ध्येय’ नामक यह भाषण स्वामी विवेकानन्द ने 27 जनवरी 1900 ई. में पासाडेना कैलिफोर्निया के सेक्सपियर क्लब के समक्ष दिया था। इसमें भारत के दुखी मानवों की वेदना विहृल उस महात्मा के हृदय का बोलता हुआ चित्र है। इसमें प्रस्तुत है उसका उपचार जिसके आधार पर वे मातृभूमि को पुनः अतीत यश पर ले जाना चाहते है। यही एकमात्र ऐसा अवसर था, जब उन्होंने जनता के समक्ष अपने जी की जलन रखी, अपने आन्तरिक संघर्ष और वेदना को उघाड़ा।

हमें आशा है, इस पुस्तक से जनता का अवश्य लाभ होगा।


स्वामी विवेकानन्द (१२ जनवरी,१८६३- ४ जुलाई,१९०२) वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् १८९३ में आयोजित विश्व धर्म महासम्मेलन में सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा।अत्यन्त गरीबी में भी नरेन्द्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते । उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। रामकृष्ण जी बचपन से ही एक पहुँचे हुए सिद्ध पुरुष थे। स्वामीजी ने कहा था की जो व्यक्ति पवित्र ढँग से जीवन निर्वाह करता है उसी के लिये अच्छी एकाग्रता प्राप्त करना सम्भव है!







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मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

'मेरे भारत, मेरे स्वदेश'


'मेरे भारत, मेरे स्वदेश' श्री गुलाब खण्डेलवाल की रचना है जिसमे देशभक्ति के गीत एवं दोहे दिए गए है। इसकी रचना १९६२ में की गयी थी ।

आजकल कवि गुलाब अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के अध्यक्ष है ।
महाकवि गुलाब खंडेलवाल (Gulab Khandelwal) का जन्म अपने ननिहाल राजस्थान के शेखावाटी प्रदेश के नवलगढ़ नगर में २१ फरवरी सन्‌ १९२४ ई। को हुआ था।

महाकवि गुलाब खंडेलवाल की कुछ पुस्तकें महाविद्यालयों के शिक्षण-पाठ्यक्रमों में भी रह चुकी हैं जो इस प्रकार हैं -

१. ’आलोक-वृत्त’- खंडकाव्य- १९७६ से उत्तर प्रदेश में इंटरमीडिएट बोर्ड में पाठ्‍यक्रम में स्वीकृत है.
२. ’उषा’- महाकाव्य - मगध विश्वविद्यालय के बी.ए. के पाठ्‍यक्रम में १९६८ से कई वर्षों तक रहा.
३. ’कच-देवयानी’-खंडकाव्य- मगध विश्वविद्यालय के बी. ए. कोर्स में था.
४. ’आलोक-वृत्त’-खंडकाव्य- १९७६ से मगध विश्वविद्यालय के बी. ए. के कोर्स में था.

महादेवी वर्मा ने एक बार अफ़सोस जताते हुये कहा, "आपके साथ हिन्दीवालों ने न्याय नहीं किया!" उनके काव्य-पाठ को सुनकर वे बोलीं, "मेरे आँखों के सम्मुख एक-एक कर चित्र आते जा रहे थे." स्पष्‍टतः उनका संकेत गुलाबजी के काव्य की बिम्बात्मकता की ओर था.


"आपका ’बलि-निर्वास’ खूब है। मैंने और पंतजी ने उसे अत्यन्त चाव से पढ़ा है। हम दोनों आपके परम प्रशंसक हैं."- हरिवंश राय बच्चन


"भाव और भाषा का इतना सुन्दर सामन्जस्य कदाचित ही हिन्दी के किसी कवि ने इस अवस्था में ऐसा किया हो." - श्री बेढब बनारसी





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बुधवार, 20 अप्रैल 2011

रहिमन शतक





प्रस्तुत पुस्तक में रहीम के दोहे दिए गए है

रहीम मध्यकालीन सामंतवादी संस्कृति के कवि थे। रहीम का व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा-संपन्न था। वे एक ही साथ सेनापति, प्रशासक, आश्रयदाता, दानवीर, कूटनीतिज्ञ, बहुभाषाविद, कलाप्रेमी, कवि एवं विद्वान थे। रहीम सांप्रदायिक सदभाव तथा सभी संप्रदायों के प्रति समादर भाव के सत्यनिष्ठ साधक थे। वे भारतीय सामासिक संस्कृति के अनन्य आराधक थे। रहीम कलम और तलवार के धनी थे और मानव प्रेम के सूत्रधार थे।






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मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

राजस्थान के वीर




राजस्थान हमेशा से ही वीरों की करमभूमि रहा है। इस प्रदेश में एक से बढ़कर एक वीर पुरुष हुए है। इस पुस्तक में कुछ ऐसे ही वीरों की जीवन-गाथा दी गयी है जिनके शौर्य की कीर्ति आज भी अमर है।

पुस्तक में राणा संग, महाराणा प्रताप, गोरा-बादल, महाराणा कुम्भा, वीर दुर्गादास आदि की जीवन गाथा दी गयी है। जिन्हें पढ़कर आप रोमांचित हो उठेंगे।

अवश्य पढ़ें।


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सोमवार, 18 अप्रैल 2011

अपनी बात

पिछले कुछ दिनों से 'अपनी हिंदी' में कुछ तकनीकी दिक्कतें आ रही थी जिसकी वजह से हम आप लोगो को लगातार पुस्तकें उपलब्ध नहीं करवा पाएं और आपके इ-मेल का भी जवाब नहीं दे पाएं। आपकी फरमायशों पर भी कार्य नहीं हो पाया। इसका हमें बहुत खेद है।

बहरहाल, अब हमने इन सभी दिक्कतों को काफी हद तक सुलझा लिया है और उम्मीद है कि आगे से हम आपको हिंदी की दुर्लभ पुस्तकें लगातार उपलब्ध करवा पाएंगे।

इसके अलावा गूगल द्वारा भी 'अपनी हिंदी' में संभावित virus की सूचना दी जा रही थी जिससे पाठकों को काफी परेशानी हुई । जबकि ऐसा कुछ इस साईट पर नहीं था । गूगल द्वारा कुछ विज्ञापनों को ही virus समझा जा रहा था. हमने गूगल से इस विषय में संवाद किया जिसके परिणामस्वरूप गूगल ने इस वेबसाइट को सुरक्षित घोषित कर दिया है। इसलिए आपको घबराने की कोई जरूरत नहीं है । 'अपनी हिंदी' पूरी तरह से सुरक्षित है।


आप भी हिंदी साहित्य को बढ़ावा दें और 'अपनी हिंदी' के बारे में अपने मित्रों-परिचितों को बताएं ।

धन्यवाद ।




- प्रबंधक
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जैसे चाहो, वैसे बन जाओ





'जैसे चाहो, वैसे बन जाओ' जेम्स एलन की प्रसिद्ध अंग्रेजी पुस्तक 'As a Man Thinketh' का हिंदी अनुवाद है। इसकी रचना जेम्स एलन ने १९०२ में की थी लेकिन ये पुस्तक आज भी उतनी ही लोकप्रिय है। आज भी इसका महत्व उतना ही है।

यह पुस्तक प्रेरणा से भरपूर है और मनुष्य के व्यक्तित्व-विकास में सहायक है। हर मनुष्य को इसे अवश्य पढना चाहिए। आप भी इसे पढ़कर इससे लाभ उठाएं ।



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रविवार, 17 अप्रैल 2011

अरबों के देश में - यात्रा-वृतांत



प्रस्तुत पुस्तक 'अरबों के देश में' श्री गोपाल व्यास द्वारा लिखित है। इसमें उन्होंने अपनी अरब देशों की यात्रा का रोचक वर्णन किया है। लेखक की भाषा चुटीली है जो पाठक के मन को गुदगुदाती है।

पंडित गोपालप्रसाद व्यास हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार थे।

हिन्दी में व्यंग्य-विनोद की नई धारा के जनक। हास्यरस में पत्नीवाद के प्रवर्तक।

जन्मः सूरदास की निर्वाणस्थली परासौली (गांव- महमदपुर, गोवर्धन कस्बे के निकट, जिला-मथुरा, उत्तर प्रदेश) जन्मपत्री के अनुसार माघ शुक्ल 10, संवत्‌ 1972 विक्रमी और स्कूली सर्टिफिकेट के अनुसार 13 फरवरी, 1915 ई.।

शिक्षाः प्रारंभिक शिक्षा पहले परासौली के निकट भवनपुरा में। उसके बाद अथ से इति तक मथुरा में केवल कक्षा सात तक। स्वतंत्रता-संग्राम के कारण उसकी भी परीक्षा नहीं दे सके और स्कूली शिक्षा समाप्त हो गई। पिंगल पढ़ा स्व0 नवनीत चतुर्वेदी से। अंलकार, रस-सिद्धांत पढ़े सेठ कन्हैयालाल पोद्दार से। नायिका भेद का ज्ञान सैंया चाचा से और पुरातत्व, मूर्तिकला, चित्रकला आदि का डॉ0 वासुदेवशरण अग्रवाल से। विशारद और साहित्यरत्न का अध्ययन तथा हिन्दी के नवोन्मेष का पाठ पढ़ा डॉ0 सत्येन्द्र से।


विशेषः ब्रजभाषा के कवि, समीक्षक, व्याकरण, साहित्य-शास्त्र, रस-रीति, अलंकार, नायिका-भेद और पिंगल के मर्मज्ञ। हिन्दी में व्यंग्य-विनोद की नई धारा के जनक। हास्यरस में पत्नीवाद के प्रवर्तक। सामाजिक, साहित्यिक, राजनैतिक व्यंग्य-विनोद के प्रतिष्ठाप्राप्त कवि एवं लेखक और 'हास्यरसावतार' के नाम से प्रसिद्ध।

पत्रकारिता के क्षेत्र में: 'साहित्य संदेश' आगरा, 'दैनिक हिन्दुस्तान' दिल्ली, 'राजस्थान पत्रिका' जयपुर, 'सन्मार्ग', कलकत्ता में संपादन तथा दैनिक 'विकासशील भारत' आगरा के प्रधान संपादक। स्तंभ लेखन में सन्‌ 1937 से अंतिम समय तक निरंतर संलग्न। ब्रज साहित्य मंडल, मथुरा के संस्थापक और मंत्री से लेकर अध्यक्ष तक। दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संस्थापक और 35 वर्षों तक महामंत्री और अंत तक संरक्षक। श्री पुरुषोत्तम हिन्दी भवन न्यास समिति के संस्थापक महामंत्री के पद पर अंत तक रहे। लाल किले के 'राष्ट्रीय कवि-सम्मेलन' और देशभर में होली के अवसर पर 'मूर्ख महासम्मेलनों' के जन्मदाता और संचालक।

देहावसान: शनिवार, 28 मई, 2005, प्रातः 6 बजे

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शनिवार, 16 अप्रैल 2011

ग्रीस और रोम की दन्त कथाएँ - कहानी संग्रह


कहानियां भला किसे अच्छी नहीं लगती? खासकर बच्चों को तो कहानियां बहुत प्रिय होती है . हम सब कहानियां सुन-सुन कर ही बड़े हुए है। इसलिए हम आपके मनोरंजन के लिए आज लेकर आये है - ग्रीस और रोम की दन्त कथाएँ

पुस्तक में शामिल सभी कहानियां मनोरंजक है और पाठकों को अपने साथ बांधे रखती है। इनसे पाठकों को इन देशों के इतिहास और संस्कृति के बारे में भी बहुत कुछ जानने को मिलेगा।

अवश्य पढ़ें।

पृष्ठ संख्या: ११०
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