वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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बृहस्पतिवार, 24 जून 2010

जल-चिकित्सा

'जल-चिकित्सा' पुस्तक प्राकृतिक चिकित्सा पर आधारित पुस्तक है। इसमें जल के प्रयोग द्वारा विभिन्न रोगों की अचूक चिकित्सा का वर्णन किया गया है।

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बुधवार, 9 जून 2010

लक्ष्मीकांत वर्मा का नाटक - उस रात की बात

'उस रात की बात' लक्ष्मीकांत वर्मा का एक प्रसिद्ध नाटक है।


लक्ष्मीकांत वर्मा का जन्म बस्ती (उ.प्र.) में हुआ। शिक्षा उर्दू, फारसी से प्रारंभ हुई तथा लेखन हिन्दी से। पहले राजनीति में सक्रिय रहे, किंतु पिछले 30 वर्षों से स्वतंत्र लेखन में संलग्न हैं। इनकी लेखनी गजल, कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक, कविता, सभी साहित्यिक विधाओं पर चली है। इनकी मुख्य कृतियां हैं : 'नए प्रतिमान, 'आदमी का जहर, 'धुएं की लकीरें, 'सीमांत के बादल तथा 'अतुकांत। ये कविता में मानव के खण्डित व्यक्तित्व को व्यक्त करना चाहते हैं।


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सोमवार, 7 जून 2010

सआदत हसन मंटो की कहानी - गोली


'गोली' सआदत हसन मंटो की एक चर्चित कहानी है जिसमे इंसान के दोहरे चरित्र को उजागर किया गया है।

मंटो का जन्म 11 मई 1912 को अमृतसर के एक पुश्तैनी बेरिस्टर परिवार में हुआ था.

सआदत हसन के क्राँतिकारी दिमाग़ और अतिसंवेदनशील हृदय ने उसे मंटो बना दिया और तब जलियाँवाला बाग़ की घटना से निकल कर कहानी 'तमाशा' आई. यह मंटो की पहली कहानी थी. धीरे-धीरे मंटो का रूझान रूसी साहित्य की ओर बढ़ने लगा. जिसका प्रभाव हमें उनके रचनाकर्म में दिखाई देता है.


1948 के बाद मंटो पाकिस्तान चले गए. जहाँ उनके 14 कहानी संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें 161 कहानियाँ संग्रहित हैं. इन कहानियों में 'सियाह हाशिए', 'नंगी आवाज़ें', 'लाइसेंस', 'खोल दो', 'टेटवाल का कुत्ता', 'मम्मी', 'टोबा टेक सिंह,' 'फुंदने', 'बिजली पहलवान', 'बू', 'ठंडा गोश्त', 'काली शलवार' और 'हतक' जैसी तमाम चर्चित कहानियाँ शामिल हैं.
जिनमें कहानी 'बू', 'काली शलवार','ऊपर-नीचे', 'दरमियाँ', 'ठंडा गोश्त', 'धुआँ' पर लंबे मुकदमे चले. हालाँकि इन मुकदमों से मंटो मानसिक रूप से परेशान ज़रूर हुए लेकिन उनके तेवर ज्यों के त्यों थे.

मंटो सिर्फ़ 42 साल जिए, लेकिन उनके 19 साल के साहित्यिक जीवन से हमें 230 कहानियाँ, 67 रेडियो नाटक, 22 शब्द चित्र और 70 लेख मिले.
तमाम ज़िल्लतें और परेशानियाँ उठाने के बाद, 18 जनवरी 1955 में मंटो ने अपने उन्हीं तेवरों के साथ, इस दुनिया को अलविदा कह दिया.


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