वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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गुरुवार, 7 जून 2012

पंडित मदनमोहन मालवीय - एक जीवनी


असाधारण महापुरुष पंडित महामना मदनमोहन मालवीय का जन्म भारत के उत्तरप्रदेश प्रान्त के प्रयाग में २५ दिसम्बर सन १८६१ को एक साधारण परिवार में हुआ था । इनके पिता का नाम ब्रजनाथ और माता का नाम भूनादेवी था । चूँकि ये लोग मालवा के मूल निवासी थे अस्तु मालवीय कहलाए । आपने १८८४ ई० में उच्च शिक्षा समाप्त की। बालकृष्ण भट्ट के हिन्दी प्रदीप में हिन्दी के विषय में उन्होंने उन दिनों बहुत कुछ लिखा। सन् १८८६ ई० में कांग्रेस के दुसरे अधिवेशन के अवसर पर कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह से उनका परिचय हुआ त्ा मालवीय जी की भाषा से प्रभावित होकर राजा साहब ने उन्हें दैनिक हिन्दुस्तान का सम्पादक बनने पर राजी कर लिया।

वकालत के क्षेत्र में मालवीयजी की सबसे बड़ी सफलता चौरीचौरा कांड के अभियुक्तों को फाँसी से बचा लेने की थी । राष्ट्र की सेवा के साथ ही साथ नवयुवकों के चरित्र-निर्माण के लिए और भारतीय संस्कृति की जीवंतता को बनाए रखने के लिए मालवीयजी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की ।

राष्ट्र की सेवा के साथ ही साथ नवयुवकों के चरित्र-निर्माण के लिए मालवीयजी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रणेता महामना पंडित मदन मोहन मालवीय इस युग के आदर्श पुरुष थे। अपने जीवन-काल में पत्रकारिता, वकालत, समाज-सुधार, मातृ-भाषा तथा भारतमाता की सेवा में अपना जीवन अर्पण करने वाले इस महामानव ने जिस विश्वविद्यालय की स्थापना की उसमें उनकी परिकल्पना ऐसे विद्यार्थियों को शिक्षित करके देश सेवा के लिए तैयार करने की थी, जो देश का मस्तक गौरव से ऊचा कर सकें।

यह द्रष्टव्य है कि महामना मालवीय सत्य, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, देशभक्ति तथा आत्म-त्याग में इस देश में अद्वितीय स्थान रखते थे। इस बात को दोहराने की आवश्यकता नहीं है कि उपर्युक्त समस्त आचरण पर महामना सदैव उपदेश ही नहीं देते थे, परन्तु उसका सर्वथा पालन भी किया करते थे।

अपने व्यवहार में महामना सदैव मृदुभाषी रहे। कर्म ही उनका जीवन था। ढेर सारी संस्थाओं के जनक एवं सफल संचालक के रूप में उनकी विधि-व्यवस्था का सुचारू सम्पादन करते हुए भी रोष अथवा कड़ी बोली का प्रयोग कभी नहीं किया।

गाँधीजी इन्हें नररत्न कहते थे और अपने को इनका पुजारी ।
माँ भारती का यह सच्चा सेवक और ज्ञान, सच्चाई का सूर्य १२ नवम्बर १९४६ को सदा के लिए अस्त हो गया ।



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7 टिप्पणियां:

ajit gupta on 19/11/10 10:32 am ने कहा…

मालवीय जी के बारे में संक्षिप्‍त जानकारी देकर सभी को प्रेरित करने के लिए आभार।

महेन्द्र मिश्र on 19/11/10 10:49 am ने कहा…

महामना के बारे में बहुत बढ़िया जानकारी दी है ....आभार ...

Akshay kumar ojha on 19/11/10 5:59 pm ने कहा…

बहुत ही सुन्दर भेट है ये जितनी तारीफ की जाये उतना ही कम
शुक्रिया

बेनामी ने कहा…

लिपि सम्बन्धी समस्या को इतनी आसानी से सुलझाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद्.
साथ ही 'अपनी हिंदी' के दिन पर दिन सँवरते स्वरुप के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामना.
अनुराधा.

Govind Dixit ने कहा…

apni hindi ko paa kar aisa lag raha hai maano samast saahitya paa liya ho.

Govind Dixit ने कहा…

apni hindi ki prasanshaa mein kuchh kahanaa 'sooryasya deep darshanam"maatra hoga.

Admin on 16/8/11 8:43 am ने कहा…

धन्यवाद्!
'अपनी हिंदी' पर आते रहिये!

- प्रबंधक

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