वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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मंगलवार, 5 जून 2012

वृन्दावनलाल वर्मा का ऐतिहासिक नाटक - ललित विक्रम

इस पुस्तक में इतिहास के सुंदर अतीत की एक एक गाथा को उसके अनुरूप वातावरण में सफलतापूर्वक उपस्थित किया है। राजा, सभा, आश्रम, गुरु, शिष्य सभी के चित्रण में नाटककार की कल्पना संतुलित तथ्यनिष्ठ रही हैं, जिससे हमें युग विशेष की परिस्थितियाँ विकास की दिशा और पथ की बाधाएँ अपरिचित नहीं जान पड़तीं।

विद्यार्थी जीवन में ही आपने शेक्सपीयर के चार नाटकों का हिन्दी अनुवाद किया। सन् १९१३ में वकालत शुरु की, सन् १९०९ में राजपूत की तलवार --कहानी संग्रह-- प्रकाशित हुई।

महान उपन्यासकार श्री वृन्दावनलाल वर्मा का जन्म मऊरानीपुर --झाँसी (Jhansi) में ९ जनवरी सन् १८८९ ई. में हुआ। उनके पिता श्री अयोध्या प्रसाद श्रीवास्तव कानूनगो थे। 

विद्यार्थी जीवन में ही आपने शेक्सपीयर के चार नाटकों का हिन्दी अनुवाद किया। सन् १९१३ में वकालत शुरु की, सन् १९०९ में राजपूत की तलवार --कहानी संग्रह-- प्रकाशित हुई।

"गढ़कुडार', "विराटा की पद्मिनी', "झाँसी (Jhansi) की रानी', "हंस मयूर', "माधवराय सिन्धिया', "मृगनयनी', पूर्व की ओर, ललित विक्रम, भुवन विक्रम, अहिल्याबाई "कीचड़' और "कमल' "देवगढ़ की मुस्कान', "रामगढ़ की रानी', "महारानी दुर्गावती', "अब क्या हो', "सोती आग', --ऐतिहासिक उपन्यास--, "लगन, "संगम', "प्रत्यागत', कुण्डली चक्र, प्रेम की भेंट, मंगलसूत्र, राखी की लाज, अचल मेरा कोई, बाँस का फांस, खिलौनी की खोज, कनेर, पीले हाथ, नीलकंठ, केवट, देखा-देखी, उदय, किरण, आहत, आदि सामाजिक उपन्यासों का लेखन पूर्ण किया।

अंगूठी का दान, कलाकार का दण्ड, रश्मि समूह, शरणागत, मेढ़क का ब्याह, ऐतिहासिक कहानियां, गौरव गाथाएं, सरदार राने खां, राष्ट्रीय ध्वज की आन, एक दूसरे के लिए हम, आदि कहानियां लिखी। 

झाँसी (Jhansi)की रानी, बीरबल, चले चलो, नाटक तथा तीन एकांकी लिखे। हृदय की हिलोर, --गद्य काव्य--, दबे पांव --शिकार अनुभव, सोना --आंचलिक कहानी--, युद्ध के मोर्चे से, --वीरगाथा जीवनी-- १८५७ के अमर वीर --स्केच-- अपनी कहानी --जीवनी-- बुंदेलखंड (bundelkhand) के लोकगती, काश्मीर का कांटा, --राजनैतिक नाटक-- भारत यह है --रिपोर्ताज़-- आदि विविध रचनाएं लिखी। ललितादित्य डूबता शंखनाद, अमर ज्योति, आदि प्रकाश्य है। आपकी विभिन्न पुस्तकों का अनुवाद देशी और विदेशी भाषाओं में सम्पन्न हुआ।

भारत सरकार द्वारा सन् १९६५ ई. में "पदम् भूषण' द्वारा सम्मानित हुए। आगरा विश्वविद्यालय द्वारा सन् १९६८ में डी.लिट. उपाधि प्रदत्त हुयी। हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा सन् १९६५ में ""साहित्य वाचस्पति उपाधि प्रदान की गयी। "सोवियत भूमि नेहरु पुरस्कार', "साहित्य अकादमी पुरस्कारद्ध, "हिन्दुस्तानी अकादमी पुरस्कारद्ध तथा "बटुक प्रसाद पुरस्कार' --काशी नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी-- प्राप्त हुए। २३ फरवरी सन् १९६९ ई. को ८१ वर्ष की आयु में स्वर्गवासी हुए।

श्री वर्मा जी की कहानियां, उपन्यास, नाटक आदि आंचलिकता का गुण लिये हुए हैं। उनकी तुलना या प्रेरणा स्रोत सर वाल्टर स्काट को माना जाता है, यह भ्रामक है। उनकी घटनाचक्रों की पृष्ठभूमि, पात्रों की मानसिकता तथा वातावरण शुद्धतम भारतीय तथा बुंदेलखंड (bundelkhand) है।

बुंदेलखंड (bundelkhand) का चप्पा-चप्पा उनका जाना और छाना हुआ था। यहाँ के निवसी उनकी रचनाओं में अनुप्राणित हैं। बुन्देलाण्ड का समस्त जीवन उनमें प्रतिफलित है। उनका जीवन एक महाकाव्य था। जिसमें विविध सर्ग उनकी रचनाएं थीं। उनके जीवन में बुंदेलखंड (bundelkhand) की मिट्टी की सुगन्ध बसी हुयी थी और वही उनकी रचनाओं में भी मुखरित थी। हिन्दी में एक वही लेखक थे जिसमें एक व्यापक भूखण्ड का अतीत, वर्तमान और भविष्य बोलता है। मानो वह कोई दपंण है जिसमें युगों के चित्र उभरतें, मिटते और मिट-मिट कर फिर उभरते हैं।



फाइल का आकार: १३ Mb



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5 टिप्पणियां:

राजभाषा हिंदी on 25/9/10 10:55 am ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
साहित्यकार-बाबा नागार्जुन, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

Akshay kumar ojha on 26/9/10 6:39 pm ने कहा…

बहुत ही अनमोल भेट है ये आपकी हम साहित्य प्रेमियों के लिए धन्यवाद

बेनामी ने कहा…

LINK NOT WORKING

Admin ने कहा…

Link Working Fine...

Atul Kumar Jaiswal on 29/7/11 5:06 pm ने कहा…

इसे freakshare के आलावा कही और भी उपलब्ध कराये इसमें बहुत टाइम लगता है लगभग १० मिनत लोगो को असुविध होती है

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