महेंद्रभटनागर-विरचित काव्य-कृति 'जूझते हुए' में मनुष्य की संघर्ष-गाथा को वाणी प्रदान की गयी है।
सन् १९८४ में, 'किताब महल', इलाहाबाद से प्रकाशित प्रस्तुत कृति में सन् १९७२ से १९७६ तक की रचित ४५ कविताएँ समाविष्ट हैं। कथ्य की दृष्टि से इसमें अनेक प्रकार की कविताएँ संकलित हैं। यथा — आत्म-बोध की कविताएँ, समकालीन विडम्बनाओं को प्रत्यक्ष करती व्यंग्य कविताएँ, आपात्काल का विरोध करते बुलन्द स्वर, श्रमजीवी वर्ग की वाम-चेतना आदि। प्रकृति और प्रणय को भी इसमें स्थान मिला है। प्रगतिवादी-जनवादी हिन्दी-कविता की कृति 'जूझते हुए' कवि महेंद्रभटनागर के कविता-सरोकारों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करत्ती है।
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