वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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सोमवार, 17 मई 2010

ओ. हेनरी की कहानी - हरा दरवाजा

'हरा दरवाजा' अमेरिकन कहानी लेखक . हेनरी (या विलियम सिडनी पोर्टर) की एक प्रसिद्ध कहानी है ।

सोलह वर्ष की उम्र में उन्होने स्कूल छोड़ दिया, पर उनकी पढ़ने-लिखने की आतुरता नहीं छूटी। बचपन में उन्होने ग्रीन्सबरो की एक दवाइयों की दुकान में काम किया था, जहां अब तक उसकी जयन्ती मनायी जाती है। उन्नीस वर्ष की अवस्था में वह अपना स्वास्थ्य सुधारने के लिए टेक्सास प्रदेश के गोचरों में रहने चला गया। वहां उसने घुड़सवारी सीख ली और जंगली, अड़ियल घोड़ो को भी वश में करने लगा। फ़िर ऑस्टिन में उसे एक खेती-बाड़ी के दफ़्तर में नौकरी मिल गयी।

आपने आस-पास के चित्रमय जीवन की जिन वस्तुओं का भी उसे परिचय हुआ, वे सब की सब उसकी कहानियों में छन आयीं। यही कारण है कि उसकी कहानियां अधिकतर चरागाहों के प्रदेश, मध्य अमरीका या न्यूयार्क में घटित होती है। शहरी जीवन की कहानियों में जिनके लिए वह प्रसिद्ध है, जीवन की विडम्बनाओं कीस्वीक्रति हैं। वे उनके अपने कटु अनुभवों के प्रतिबिम्ब हैं।


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शुक्रवार, 14 मई 2010

जगदीश चन्द्र माथुर का नाटक - कोणार्क


'कोणार्क' जगदीश चन्द्र माथुर का एक प्रसिद्ध नाटक हैयह नाटक कोणार्क के सूर्य मंदिर पर आधारित है ।

कोणार्क का सूर्य मंदिर (जिसे अंग्रेज़ी में ब्लैक पगोडा भी कहा गया है), भारत के उड़ीसा राज्य के पुरी जिले के पुरी नामक शहर में स्थित है। इसे लाल बलुआ पत्थर एवं काले ग्रेनाइट पत्थर से १२३६– १२६४ ई।पू. में गंग वंश के राजा नृसिंहदेव द्वारा बनवाया गया था। यह मंदिर, भारत की सबसे प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। इसे युनेस्को द्वारा सन १९८४ में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है।

कलिंग शैली में निर्मित यह मंदिर सूर्य देव(अर्क) के रथ के रूप में निर्मित है। इस को पत्थर पर उत्कृष्ट नक्काशी करके बहुत ही सुंदर बनाया गया है। संपूर्ण मंदिर स्थल को एक बारह जोड़ी चक्रों वाले, सात घोड़ों से खींचे जाते सूर्य देव के रथ के रूप में बनाया है। मंदिर अपनी शिल्पाकृतियों के लिये भी प्रसिद्ध है।

इसे हमारे पास प्रिंसेस कौशल्या ने भेजा हैआशा है, आपको पसंद आएगा


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गुरुवार, 13 मई 2010

ओ. हेनरी की कहानी - उपहार



'उपहार' प्रसिद्ध अमेरिकन लेखक . हेनरी (या विलियम सिडनी पोर्टर) की कहानी है । कहानी में मानवीय भावनाओं का सुंदर चित्रण हुआ है ।

ओ. हेनरी एक प्रसिद्ध अमेरिकन कहानी लेखक थे।

सोलह वर्ष की उम्र में उन्होने स्कूल छोड़ दिया, पर उनकी पढ़ने-लिखने की आतुरता नहीं छूटी। बचपन में उन्होने ग्रीन्सबरो की एक दवाइयों की दुकान में काम किया था, जहां अब तक उसकी जयन्ती मनायी जाती है। उन्नीस वर्ष की अवस्था में वह अपना स्वास्थ्य सुधारने के लिए टेक्सास प्रदेश के गोचरों में रहने चला गया। वहां उसने घुड़सवारी सीख ली और जंगली, अड़ियल घोड़ो को भी वश में करने लगा। फ़िर ऑस्टिन में उसे एक खेती-बाड़ी के दफ़्तर में नौकरी मिल गयी।

आपने आस-पास के चित्रमय जीवन की जिन वस्तुओं का भी उसे परिचय हुआ, वे सब की सब उसकी कहानियों में छन आयीं। यही कारण है कि उसकी कहानियां अधिकतर चरागाहों के प्रदेश, मध्य अमरीका या न्यूयार्क में घटित होती है। शहरी जीवन की कहानियों में जिनके लिए वह प्रसिद्ध है, जीवन की विडम्बनाओं कीस्वीक्रति हैं। वे उनके अपने कटु अनुभवों के प्रतिबिम्ब हैं।


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सोमवार, 10 मई 2010

आयोडीन सैनिक - विज्ञान साहित्य


'आयोडीन सैनिक ' पुस्तक में बताया गया है कि हमारे जीवन में आयोडीन का कितना महत्व है, आयोडीन की कमी से क्या-क्या बीमारियाँ हो सकती है, उनका क्या इलाज है इत्यादि ।

आयोडीन (Iodine) एक रासायनिक तत्त्व है। आयोडिन हमारे आहार के प्रमुख पोषक तत्वों में से है और इसकी कमी से दिमाग़ और शरीर के विकास से जुड़ी कई बीमारियाँ होती हैं. दुनिया में प्रति वर्ष लाखों बच्चे सीखने की कमज़ोर क्षमता के साथ पैदा होते है क्योंकि उनकी माताओं ने गर्भावस्था के दौरान भोजन में आयोडिन की पर्याप्त मात्रा नहीं लीं.आयोडिन की मदद से गर्दन के पास पाई जाने वाली थायरॉयड ग्रंथि विकास के लिए ज़रूरी हार्मोन पैदा करती है। आयोडिन की कमी के कारण बच्चों का बौद्धिक स्तर 10 से 15 प्रतिशत तक कम हो सकता है।
नोट: इस पुस्तक को नए सिरे से उपलब्ध करवा दिया गया हैअब इसे पढने में कोई मुश्किल नहीं आएगी


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शनिवार, 8 मई 2010

पंडित जवाहरलाल नेहरु की रचना - भारत की खोज


'भारत की खोज' पंडित जवाहरलाल नेहरु की लिखी हुई एक प्रसिद्ध पुस्तक है।

आइये इस पुस्तक के बारे में श्याम बेनेगल के विचार आपको पढवाते है, जिन्होंने इस पुस्तक पर एक प्रसिद्ध धारावाहिक भी बनाया था:
मैं तीन में से कोई एक चीज करना चाहता था। या तो मैं रामायण पर धारावाहिक बनाना चाहता था, या महाभारत पर, या फिर भारत की कहानी पर एक लंबा सा धारावाहिक। वह एक ऐसा दौर था, जब इस देश में टेलीविजन का तेजी से विस्तार हो रहा था। तब तक कुछ निर्माताओं ने रामायण और महाभारत पर सीरियल को बनाना शुरू भी कर दिया था। इसलिए मैंने तय किया कि मैं भारत के इतिहास पर धारावाहिक बनाऊंगा। इसके लिए मैंने नेहरू के काम को चुना। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि नेहरू की किताब ‘द डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ एक खास मकसद से लिखी गई थी। इस किताब में नेहरू भारत को एक राष्ट्र के रूप में परिभाषित करने की कोशिश कर रहे थे।
हमने समय-समय पर अपने देश को कई तरह से परिभाषित करने की कोशिश की है। 2300 साल पहले सम्राट अशोक से लेकर अब तक। इसके अलावा हमारे पास कई पौराणिक परिभाषाएं तो हैं ही। सम्राट अकबर के राज ने बाद में भारत को एक राजनैतिक परिभाषा भी देने की कोशिश की। नेहरू ने अपनी यह किताब तब लिखी, जब भारत आजाद नहीं हुआ था और इसकी आजादी की लड़ाई की वजह से वे जेल में थे। उनके लिए उस समय भारत को एक राष्ट्र के तौर पर परिभाषित करना काफी महत्वपूर्ण और जरूरी था। वह भी पश्चिम के इतिहास से एकदम अलग करके।

उस समय हमारे पास जो राष्ट्र का सिद्धांत था, वह मूल रूप में एक यूरोपीय सिद्धांत था। सैकड़ों साल के युद्ध के बाद यूरोप को देशों को एक राष्ट्र के रूप में नई पहचान मिली थी। उनकी यह पहचान जातीयता, भाषा और धर्म वगैरह कई चीजों पर आधारित थी। लेकिन भारत को इस तरीके से परिभाषित नहीं किया जा सकता। अगर आकार के हिसाब से देखें तो अपने आप में यह एक पूरे महाद्वीप की तरह ही है। इसमें अलग-अलग तरह की सभ्यता और संस्कृति वाले लोग रहते हैं। यहां आपको कई तरह की जातीय पहचान के लोग मिल जाएंगे। और उतनी तरह की भाषाएं मिल जाएंगी, जितनी तरह की किसी महाद्वीप में होती हैं। दुनिया में जितनी भी तरह के धर्म हैं उन सबके मानने वाले आपको कहीं न कहीं भारत में मिल सकते हैं।
नेहरू एक राष्ट्र के तौर पर भारत को एक परिभाषा देना चाहते थे। इस काम के लिए उन्हें इतिहास में जाने की जरूरत महसूस हुई। इसके लिए उन्होंने इस देश की उत्पत्ति और इसके विकास का अध्ययन किया। इस पूरे देश में जो विभिन्नताएं हैं, वे दिमाग को चकरा देने वाली हैं। वे यह समझने और ढूंढने की कोशिश कर रहे थे कि वे कौन से कारण हैं, जिन्होंने इतने बड़े देश को अब तक एक बनाए रखा। और इसके साथ ही इसे कभी छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटने नहीं दिया। हमारा समाज कोई एकरस यानी होमोजीनियस किस्म का समाज नहीं है। इसमें कई तरह की विभिन्नताएं हैं, लेकिन इसके साथ ही इसमें हमेशा ही ऐसा कुछ भी है, जो इसे एकजुट बनाए रखता है। नेहरू की किताब इन्हीं कारणों को खोजती और तलाशती है। मुझे लगा कि यह एक अदभुत किताब है, जो भारत की कहानी कहने का आधार बन सकती है। इसी से बना ‘भारत एक खोज’, जिसका सीधा सा अर्थ ही है- भारत की खोज।
मैंने इसका नाम ‘द डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ नहीं रखा, भारत की खोज ही रखना पसंद किया। उनकी किताब में कोई संदर्भ नहीं दिए गए हैं, क्योंकि जब उन्होंने यह किताब लिखी वे जेल में थे। इतिहास के लिए ई. पी. थॉमसन जैसे लोग उनके सलाहकार थे। थॉमसन की राय काफी दिलचस्प भी हुआ करती थी। लेकिन नेहरू एक अलग तरह का इतिहास लिखने की कोशिश कर रहे थे। पहली बार एक ऐसा इतिहास जिसके नजरिये का केंद्र भारत था। हालांकि तब तक औपनिवेशिक काल में इतिहास एक अध्ययन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय बन गया था, लेकिन उस समय जो भारत का इतिहास लिखा गया वह यूरोपीय नजरिये से लिखा गया। भारत के इतिहास को यूरोपीय लोगों की नजर से देखा गया। एक तो यह बहुत ही संक्षिप्त सा था। दूसरे यह संरक्षण देने वाले नजरिये से लिखा गया था। फिर सांस्कृतिक नजरिये से देखें तो कई बार इसमें एक तरह की घमंडभरी अक्खड़ता नजर आती थी।
नेहरू की कोशिश थी कि जब वे इतिहास की बात करें तो उसे यूरोपीय व्याख्याओं और रंगों से मुक्त कर दें। एक तरह से उनकी यह किताब प्रारंभिक और मूल किताब है। कई ऐसी चीजें थीं जिनके बारे में वे बहुत ज्यादा नहीं जानते थे, खासतौर पर दक्षिण भारत के बारे में।
और जब मैं अपना टेलीविजन सीरियल ‘भारत एक खोज’ बनाने लगा तो इसके लिए मैने 22 इतिहासकारों को नियुक्त किया। ये सब लोग किसी न किसी खास काल के विशेषज्ञ थे। तकरीबन इतने ही लोगों को मैंने सलाहकार और परामर्शदाता भी बनाया। हम किताब में छूट गई सारी खाली जगहों को भरना चाहते थे। इसके साथ ही हमने यह कोशिश भी कि जहां तथ्यों के मामले में नेहरू गलत थे वहां उन्हें ठीक भी कर दिया जाए। इसके बाद हमने ‘भारत एक खोज’ सीरियल बनाया। इसमें नेहरू सूत्रधार की तरह थे। जिसमें वे खुद भारत के इतिहास की कहानी कहते हैं। और अपनी किताब के लगातार उद्धरण भी देते हैं।
लेखक प्रसिद्ध फिल्म निर्माता हैं
‘बॉलीवुड बेबीलोन’ से साभार




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गुरुवार, 6 मई 2010

भरत नाट्यशास्त्र में नाट्यशालाओं के रूप

प्राचीन समय से ही भारतीय समाज में नाटकों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। प्राचीन भारत मैं मनोरंजन के लिए नाटकों का मंचन खूब किया जाता था । राजा और प्रजा दोनों को ही नाटक देखने का शौक था । उस समय के नाटकों के बारे में तो काफी जानकारी मिल जाती है, लेकिन इनके मंचन से सम्बंधित जानकारी काफी कम उपलब्ध है । 'भरत नाट्यशास्त्र में नाट्यशालाओं के रूप' पुस्तक में उस समय के नाटकों के मंचन तथा नाट्यशालाओं के बारे में महत्वपूर्ण और प्रमाणिक जानकारी दी गयी है।

आशा है कि यह पुस्तक हिंदी नाटकों को पसंद करने वाले जिज्ञासु पाठकों और शोधकर्ताओं को अवश्य पसंद आएगी ।


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बुधवार, 5 मई 2010

रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध रचना - रश्मिरथी


यह पुस्तक समर्पित है उन सभी पाठकों को जो इसके लिए पिछले एक साल से लगातार अनुरोध कर रहे है । पिछले एक साल में हमें सबसे ज्यादा अनुरोध इसी पुस्तक के लिए मिले है।

रश्मिरथी, जिसका अर्थ "सूर्य की सारथी" है, हिन्दी कवि रामधारी सिंह दिनकर के सबसे लोकप्रिय महाकाव्य कविताओं में से एक है । रामधारी सिंह दिनकर (२३ सितंबर १९०८- २४ अप्रैल १९७४) भारत में हिन्दी के एक प्रमुख लेखक. कवि, निबंधकार थे।

रश्मिरथी का अर्थ होता है वह व्यक्ति, जिसका रथ रश्मि अर्थात पुण्य का हो। इस काव्य में रश्मिरथी नाम कर्ण का है क्योंकि उसका चरित्र अत्यन्त पुण्यमय और प्रोज्जवल है।



कर्ण महाभारत महाकाव्य का अत्यन्त यशस्वी पात्र है। उसका जन्म पाण्डवों की माता कुन्ती के गर्भ से उस समय हुआ जब कुन्ती अविवाहिता थीं, अतएव, कुन्ती ने लोकलज्जा से बचने के लिए, अपने नवजात शिशु को एक मंजूषा में बन्द करके नदी में बहा दिया। वह मंजूषा अधिरथ नाम के सुत को मिली। अधिरथ के कोई सन्तान नहीं थी। इसलिए, उन्होंने इस बच्चे को अपना पुत्र मान लिया। उनकी धर्मपत्नी का नाम राधा था। राधा से पालित होने के कारण ही कर्ण का एक नाम राधेय भी है।



मैं उनका आदर्श, कहीं जो व्यथा न खोल सकेंगे,
पूछेगा जग, किन्तु पिता का नाम न बोल सकेंगे;
जिनका निखिल विश्व में कोई कहीं न अपना होगा,
मन में लिये उमंग जिन्हें चिर-काल कलपना होगा।

---- इसी पुस्तक से




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मंगलवार, 4 मई 2010

हिंदी उपन्यास - 'आग तपा सोना'


'आग तपा सोना' प्रसिद्ध अंग्रेजी उपन्यास 'How The Steel was Tempered' का हिंदी अनुवाद है । इसे रुसी लेखक Nikolai Ostrovsky ने लिखा था। 32 साल की आयु में ही इनका निधन हो गया था। तब तक इन्होने सिर्फ यही एक उपन्यास पूरा लिखा था।

अवश्य पढ़ें ।

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शनिवार, 1 मई 2010

आज भी खरे हैं तालाब (एक कालजयी पुस्तक)


ऐसी विरली ही पुस्तकें होती हैं जो न केवल पाठक तलाशती हैं, बल्कि तलाशे पाठकों को कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में तराशती भी हैं। अपनी प्रसन्न जल जैसी शैली तथा देश के जल स्रोतों के मर्म को दर्शाती एक पुस्तक ने भी देश को हज़ारों कर्मठ कार्यकर्ता दिए हैं। पुस्तक का नाम है 'आज भी खरे हैं तालाब'


अपने देश में बेजोड़ सुंदर तालाबों की कैसी भव्य परंपरा थी, पुस्तक उसका पूरा दर्शन कराती है। तालाब बनाने की विधियों के साथ-साथ अनुपम जी की लेखनी उन गुमनाम नायकों को भी अंधेरे कोनों से ढूँढ़ लाती है, जो विकास के नए पैमानों के कारण बिसरा दिए गए हैं।


पुस्तक के पहले संस्करण के बाद देशभर में पहली बार अपने प्राचीन जल स्रोतों को बचाने की बहस चली, लोगों ने जगह-जगह बुजुर्गों की तरह बिखरे तालाबों की सुध लेनी शुरू की। इसकी गाथा बेशक लंबी है, लेकिन फिर भी देखने का प्रयास करते हैं ।

मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित जल राणा राजेंद्र सिंह बताते हैं कि राजस्थान की उनकी संस्था तरुण भारत संघ के पानी बचाने के बड़े काम को सफल बनाने में इस पुस्तक का बहुत बड़ा हाथ है। मध्यप्रदेश के सागर जिले के कलेक्टर श्री बी. आर. नायडू, जिन्हें हिंदी भी ठीक से नहीं आती थी, पुस्तक पढ़ने के बाद इतना प्रभावित हुए कि जगह-जगह लोगों से कहते फिरे, 'अपने तालाब बचाओ, तालाब बचाओ, प्रशासन आज नहीं तो कल अवश्य चेतेगा।' श्री. नायडू की ये मामूली अलख सागर जिले के १००० तालाबों को निरंजन कर गई। ऐसी ही एक और अलख के कारण शिवपुरी जिले के लगभग ३४० तालाबों की सुध ली गई। मध्यप्रदेश के ही सीधी और दमोह के कलेक्टरों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में इस पुस्तक की सौ-सौ प्रतियाँ बाँटी। पानी के लिए तरसते गुजरात के भुज के हीरा व्यापारियों ने इस पुस्तक से प्रभावित होकर अपने पूरे क्षेत्र में जल-संरक्षण की मुहिम चलाई। पुस्तक से प्रेरणा पाकर पूरे सौराष्ट्र में ऐसी अनेक यात्राएँ निकाली गईं। पानी बचाने के लिए सबसे दक्ष माने गए राजस्थान के समाज को भी इस पुस्तक ने नवजीवन दिया। राजस्थान के प्रत्येक कोने में पुस्तक के प्रभाव के कारण सैकड़ों जल-यात्राओं के साथ-साथ हज़ारों पुरातन जल-स्रोत सँभाले गए। ऐसी अनेक यात्राएँ आज भी जारी हैं।

'आज भी खरे हैं तालाब' पुस्तक न केवल धरती का, बल्कि मन-माथे का अकाल भी दूर करती है।


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