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बुधवार, 31 मार्च 2010

हरिवंश राय बच्चन का काव्य-संग्रह - मधुबाला


आज हम आप सभी की मांग पर फिर से प्रकाशित कर रहे है - श्री हरिवंश राय बच्चन का काव्य-संग्रह - मधुबाला

कुछ पाठकों की शिकायत थी की पुस्तक खुल नहीं रही है। इसीलिए इसे फिर से प्रकाशित किया जा रहा है।



मधुबाला की रचना लेखक ने १९३४-३५ में की थी


अग्रणी कवि बच्चन की कविता का आरंभ तीसरे दशक के मध्य ‘मधु’ अथवा मदिरा के इर्द-गिर्द हुआ और ‘मधुशाला’ से आरंभ कर ‘मधुबाला’ और ‘मधुकलश’ एक-एक वर्ष के अंतर से प्रकाशित हुए। ये बहुत लोकप्रिय हुए और प्रथम ‘मधुशाला’ ने तो धूम ही मचा दी। यह दरअसल हिन्दी साहित्य की आत्मा का ही अंग बन गई है और कालजयी रचनाओं की श्रेणी में खड़ी हुई है।

इन कविताओं की रचना के समय कवि की आयु 27-28 वर्ष की थी, अतः स्वाभाविक है कि ये संग्रह यौवन के रस और ज्वार से भरपूर हैं। स्वयं बच्चन ने इन सबको एक साथ पढ़ने का आग्रह किया है

कुछ अंश:

मैं मधुबाला मधुशाला की,
मैं मधुशाला की मधुबाला!

मैं मधु-विक्रेता को प्यारी,
मधु के धट मुझ पर बलिहारी,
प्यालों की मैं सुषमा सारी,
मेरा रुख देखा करती है मधु-प्यासे नयनों की माला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!



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श्री हरिवंश राय बच्चन का काव्य-संग्रह - मधुकलश


'अपनी हिंदी' के पाठकों के लिए आज प्रस्तुत है - महान कवि और लेखक श्री हरिवंश राय बच्चन का काव्य-संग्रह - मधुकलश


इसे फिर से प्रकाशित किया जा रहा है क्योंकि कुछ पाठकों को शिकायत थी कि मधुबाला, मधुशाला और मधुकलश की पुस्तकें खुल नहीं पा रही है इसीलिए इनमे सुधार करके इन्हें फिर से उपलब्ध करवाया जा रहा है



मधुकलश की रचना लेखक ने १९३५-३६ में की थी ।


अग्रणी कवि बच्चन की कविता का आरंभ तीसरे दशक के मध्य ‘मधु’ अथवा मदिरा के इर्द-गिर्द हुआ और ‘मधुशाला’ से आरंभ कर ‘मधुबाला’ और ‘मधुकलश’ एक-एक वर्ष के अंतर से प्रकाशित हुए। ये बहुत लोकप्रिय हुए और प्रथम ‘मधुशाला’ ने तो धूम ही मचा दी। यह दरअसल हिन्दी साहित्य की आत्मा का ही अंग बन गई है और कालजयी रचनाओं की श्रेणी में खड़ी हुई है।

इन कविताओं की रचना के समय कवि की आयु 27-28 वर्ष की थी, अतः स्वाभाविक है कि ये संग्रह यौवन के रस और ज्वार से भरपूर हैं। स्वयं बच्चन ने इन सबको एक साथ पढ़ने का आग्रह किया है।
कवि ने कहा है :
‘‘आज मदिरा लाया हूं- जिसे पीकर भविष्यत् के भय भाग जाते हैं और भूतकाल के दुख दूर हो जाते हैं...., आज जीवन की मदिरा, जो हमें विवश होकर पीनी पड़ी है, कितनी कड़वी है। ले, पान कर और इस मद के उन्माद में अपने को, अपने दुख को, भूल जा।’’



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मधुशाला - (संपूर्ण) - हरिवंशराय 'बच्चन'



आप सभी की मांग पर श्री हरिवंशराय 'बच्चन' की मशहूर रचना 'मधुशाला' को फिर से प्रकाशित किया जा रहा है
हरिवंशराय 'बच्चन' का जन्म प्रयाग के पास अमोढ गाँव में हुआ। काशी से एम।ए. तक कैम्ब्रिज से अंग्रेजी साहित्य में डॉक्टरेट की। प्रयाग विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे। पश्चात भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में राजभाषा के कार्यान्वयन में लगे। 'बच्चन आधुनिक युग के शीर्षस्थ गीतकार हैं। ये कवि सम्मेलनों में अत्यधिक लोकप्रिय हुए। इनके काव्य-संग्रहों में 'मधुशाला, 'मधुबाला, 'मधुकलश, 'मिलनयामिनी, 'आकुल-अंतर, 'निशानिमंत्रण, 'बंगाल का अकाल, 'सूत की माला मुख्य हैं। इन्होंने कई कविता संग्रह संपादित किए। तीन खंडों में प्रकाशित इनकी आत्मकथा भी लोकप्रिय हुई। नौ खंडों में प्रकाशित 'बच्चन रचनावली में इनका समग्र साहित्य संकलित है। 'पद्मभूषण से अलंकृत बच्चनजी राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके हैं।


मधुशाला (अंश)
मृदु भावों के अंगूरों की
आज बना लाया हाला
प्रियतम अपने ही हाथों से
आज पिलाऊँगा प्याला;
पहले भोग लगा लूँ तेरा
फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत
करती मेरी मधुशाला!
एक बरस में एक बार ही
जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाजी
जलती दीपों की माला,
दुनियावालों किन्तु किसी दिन
आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली,
रोज मनाती मधुशाला!
मुसलमान औ हिंदू हैं दो,
एक मगर उनका प्याला,
एक मगर उनका मदिरालय,
एक मगर उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक
मस्जिद-मंदिर में जाते,
बैर बढाते मस्जिद-मंदिर,
मेल कराती मधुशाला!
ज्ञात हुआ यम आने को है
ले अपनी काली हाला,
पंडित अपनी पोथी भूला,
साधू भूल गया माला,
और पुजारी भूला पूजा
ज्ञान सभी ज्ञानी भूला,
किन्तु न भूला मरकर के भी
पीनेवाला मधुशाला!
मतवालापन हाला से ले,
मैंने तज दी है हाला,
पागलपन लेकर प्याले से
मैंने त्याग दिया प्याला,
साकी से मिल, साकी में मिल
अपनापन मैं भूल गया,
मिल मधुशाला की मधुता में,
भूल गया मैं मधुशाला!



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मंगलवार, 30 मार्च 2010

प्रसिद्ध साहित्यकार यशपाल जी की कहानी - डॉक्टर


'अपनी हिंदी' में आज प्रस्तुत है - प्रसिद्ध साहित्यकार यशपाल जी की कहानी - डॉक्टर

यशपाल
(३ दिसंबर १९०३ - २६ दिसंबर १९७६) का नाम आधुनिक हिन्दी साहित्य के कथाकारों में प्रमुख है। ये एक साथ ही क्रांतिकारी एवं लेखक दोनों रूपों में जाने जाते है। प्रेमचंद के बाद हिन्दी के सुप्रसिद्ध प्रगतिशील कथाकारों में इनका नाम लिया जाता है।

अपने विद्यार्थी जीवन से ही यशपाल क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़े, इसके परिणामस्वरुप लम्बी फरारी और जेल में व्यतीत करना पड़ा । इसके बाद इन्होने साहित्य को अपना जीवन बनाया, जो काम कभी इन्होने बंदूक के माध्यम से किया था, अब वही काम इन्होने बुलेटिन के माध्यम से जनजागरण का काम शुरु किया। यश पाल को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन १९७० में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।


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शुक्रवार, 26 मार्च 2010

राहुल सांकृत्यायन का यात्रा वृतांत - ईरान


'अपनी हिंदी' में प्रस्तुत है - राहुल सांकृत्यायन का यात्रा वृतांत - ईरान ।

इसमें उनकी ईरान यात्रा का वर्णन किया गया है। पुस्तक बहुत ही रोचक है। अवश्य पढ़ें।


राहुल सांकृत्यायन जिन्हें महापंडित की उपाधि दी जाती है, हिन्दी के एक प्रमुख साहित्यकार थे । वे एक प्रतिष्ठित बहुभाषाविद् थे और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में उन्होंने यात्रा वृतांत/यात्रा साहित्य तथा विश्व-दर्शन के क्षेत्र में साहित्यिक योगदान किए । वह हिंदी यात्रा साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। बौद्ध धर्म पर उनका शोध हिन्दी साहित्य में युगान्तरकारी माना जाता है, जिसके लिए उन्होंने तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक भ्रमण किया था । इसके अलावा उन्होंने मध्य-एशिया तथा कॉकेशस भ्रमण पर भी यात्रा वृतांत लिखे जो साहित्यिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं ।
२१वीं सदी के इस दौर में जब संचार-क्रान्ति के साधनों ने समग्र विश्व को एक ‘ग्लोबल विलेज’ में परिवर्तित कर दिया हो एवं इण्टरनेट द्वारा ज्ञान का समूचा संसार क्षण भर में एक क्लिक पर सामने उपलब्ध हो, ऐसे में यह अनुमान लगाना कि कोई व्यक्ति दुर्लभ ग्रन्थों की खोज में हजारों मील दूर पहाड़ों नदियों के बीच भटकने के बाद, उन ग्रन्थों को खच्चरों पर लादकर अपने देश में लाए, रोमांचक लगता है। पर ऐसे ही थे भारतीय मनीषा के अग्रणी विचारक, साम्यवादी चिन्तक, सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत, सार्वदेशिक दृष्टि एवं घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के महान् पुरूष राहुल सांकृत्यायन।
राहुल सांकृत्यायन के जीवन का मूलमंत्र ही घुमक्कड़ी यानी गतिशीलता रही है। घुमक्कड़ी उनके लिए वृत्ति नहीं वरन् धर्म था। आधुनिक हिन्दी साहित्य में राहुल सांकृत्यायन एक यात्राकार, इतिहासविद्, तत्वान्वेषी, युगपरिवर्तनकार साहित्यकार के रूप में जाने जाते है ।



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रविवार, 21 मार्च 2010

मोपांसा की कहानी - प्रेम


किताबघर में पेश है फ़्रांस के प्रसिद्ध कहानीकार मोपांसा की कहानी - प्रेम

प्रकृतिवादी विचारधारा से प्रभावित गाय दी मोपासां (५ अगस्त, १८५०- ६ जुलाई, १८९३), निर्विवाद रूप से फ्रांस के सबसे महान कथाकार हैं। वे जब ग्यारह वर्ष के थे तभी उनके माता-पिता अलग हो गए थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा धार्मिक स्कूलों में हुई जिससे उन्हें चिढ़ थी। उन्होंने फ्रांस और जर्मनी के युद्ध में भाग लिया, अलग अलग नौकरियाँ कीं और पत्रों में स्तंभ लिखे।

इनकी प्रथम कहानी संग्रह बाल ऑप फैट थी जिसके प्रकाशित होते ही ये प्रसिद्ध हो गए। १८८० से १८९१ तक का समय इनके जीवन का सबसे महत्पूर्ण काल था। इन ११ वर्षों में मोपांसा के लगभग ३०० कहानियाँ, ६ उपन्यास, ३ यात्रा संस्मरण एवं एक कविता संग्रह प्रकाशित हुए। युद्ध कृषक जीवन, स्त्री पुरुष संबंध, आभिजात्य वर्ग और मनुष्य की भावनात्मक समस्याएँ मोपासां की रचनाओं की विषय-वस्तु बने।




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शनिवार, 20 मार्च 2010

चैतन्य महाप्रभु की कहानी


किताबघर में पेश है पुस्तक - चैतन्य महाप्रभु

इस पुस्तक में चैतन्य महाप्रभु के बारे में जानकारी दी गयी है तथा इनके जीवन की घटनाओं के बारे में भी बताया गया है तथा इनके भगवान का अवतार होने के प्रमाण भी दिए गए है ।

चैतन्य महाप्रभु {१८ फरवरी, १४८६-१५३४) वैष्णव धर्म के भक्ति योग के परम प्रचारक एवं भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। इन्होंने वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी, भजन गायकी की एक नयी शैली को जन्म दिया तथा राजनैतिक अस्थिरता के दिनों में हिंदू-मुस्लिम एकता की सद्भावना को बल दिया, जाति-पांत, ऊंच-नीच की भावना को दूर करने की शिक्षा दी तथा विलुप्त वृंदावन को फिर से बसाया और अपने जीवन का अंतिम भाग वहीं व्यतीत किया। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए महामंत्र नाम संकीर्तन का अत्यंत व्यापक व सकारात्मक प्रभाव आज पश्चिमी जगत तक में है। यह भी कहा जाता है, कि यदि गौरांग ना होते तो वृंदावन आज तक एक मिथक ही होता। वैष्णव लोग तो इन्हें श्रीकृष्ण का राधा रानी के संयोग का अवतार मानते हैं।



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गुरुवार, 11 मार्च 2010

व्यंग सतसई - हास्य-व्यंग्य की पुस्तक

'व्यंग सतसई ' एक हास्य-व्यंग्य की पुस्तक है जिसकी रचना रहीम सतसई की तर्ज पर की गयी है। पुस्तक में चुटीले दोहे और कवितायेँ दी गयी है जो पाठकों को खूब हंसाती है।

अवश्य पढ़ें।


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बुधवार, 10 मार्च 2010

हैरी पोट्टर और रहस्यमयी तहखाना

किताबघर के पाठकों के लिए प्रस्तुत है - हैरी पोट्टर सीरिज की अगली पुस्तक - ' हैरी पोट्टर और रहस्यमयी तहखाना ' ।

इसे हमें श्री राजेंद्र जांगिड ने भेजा है । इसके लिए उनका धन्यवाद् ।

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हैरी पोट्टर और पारस पत्थर

प्रस्तुत है हैरी पोट्टर सीरिज की पहली पुस्तक - हैरी पोट्टर और पारस पत्थर

यह पुस्तक हिंदी में है ।

इसे श्री राजेंद्र जांगिड ने भेजा है ।

अवश्य डाउनलोड करें ।



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मंगलवार, 9 मार्च 2010

डॉ. हरिवंश राय बच्चन का 'हलाहल'

आज किताबघर में पेश है - डॉ. हरिवंश राय बच्चन का 'हलाहल'


'मधुशाला' के रचयिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उनका जन्म 27 नवंबर, 1907 को इलाहाबाद के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद सन्‌ 1941 से 1952 तक वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अँगरेजी के प्राध्यापक रहे।

उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से 'डब्ल्यू.वी. येट्स एंड ऑकल्टिजम' विषय पर शोध किया। फिर कुछ महीने आकाशवाणी, इलाहाबाद में काम करने के बाद 1955 में वे भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में विशेष कार्याधिकारी (हिंदी) नियुक्त हुए। सन्‌ 1966 में उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया।

बच्चनजी सन्‌ 1935 में 'मधुशाला' के कारण ख्यात हुए। यह रचना तब से लेकर आज तक पाठकों को मदमत्त करती आ रही है। उनकी अन्य रचनाओं में मधुकलश, मधुकाव्य, खादी के फूल प्रमुख हैं। बच्चनजी ने अपनी आत्मकथा चार खंडों में लिखी। ये खंड सन्‌ 1969 से 1985 की अवधि में प्रकाशित हुए। इनके नाम हैं- 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' (जन्म 1936 तक), 'नीड़ का निर्माण फिर' (1951 तक), 'बसेरे से दूर' (1955 तक) और 'दशद्वार से सोपान तक' (1985 तक)


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मैन्ग्रोव - ज्वारीय वन


पेश है पुस्तक - मैन्ग्रोव - ज्वारीय वन ।

यह पुस्तक मैन्ग्रोव - ज्वारीय वन के बारे में हमें बतलाती है ।
यह पुस्तक मैंग्रोव वनों की आर्थिक व पारिस्थतिकी भूमिका और उनके संरक्षण की आवश्यकता को समझाने में सहायक होगी।
मैंग्रोव वनों में पाए जाने वाले वन्य जीवन अद्भुत विविधता लिए होता है. मैंग्रोव वनों में पाए जाने वाले जीवों में मुख्यत: अकशेरुकी जीव तथा कीट आते है. पोरीफेरा, स्नाईडेरिया, आर्थोपोडा वर्गों के जीव जड़ों के आस-पास पाए जाते है. मैंग्रोव क्षेत्रों अति महत्वपूर्ण जीवों की सैकड़ों-सैकड़ों प्रजातियाँ पायी जाती है जैसे केकड़ो की लगभग 275 प्रजातियाँ. समुद्री मछलियों की अनेक प्रजातियाँ केवल मैंग्रोव क्षेत्रों तक ही सीमित और निर्भर रहती हैं.मैंग्रोव क्षेत्रों में छोटी मछलियों के जीवन के लिए अति आवश्यक भोजन तथा आश्रय प्राप्त होते है. मूंगे की चट्टानों (कोरल रीफ) में पाए जाने वाले तमाम जीवों के जीवन चक्र में मैंग्रोव क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. तटीय क्षेत्रों पर पायी जाने वाली मछलियों की संख्या पर मैंग्रोव वनों का प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण है.

मैंग्रोव की जड़े मछलियों के लार्वा तथा छोटे बच्चों के लिए सुरक्षित आश्रय प्रदान करती हैं। मछलियों एवं अन्य अति महत्वपूर्ण समुद्री जीवों की कई ऐसी प्रजातियाँ हैं जिनका वयस्क जीवन तो सामान्यत: गहरे समुद्र तथा अन्य स्थानों पर गुजरता है किन्तु उनके बच्चे मैंग्रोव वनों में ही बड़े होते हैं. मैंग्रोव क्षेत्रों की स्वस्थ बहुतायत का मछलियों की संख्या से सीधा अनुपात देखने को मिलता है. मैंग्रोव क्षेत्रों में पायी जाने वाली मछलियों का इस वातावरण के तापमान तथा भौतिक और रासायनिक परिवर्तनों के साथ अनुकूलन अति आवश्यक है. कुछ अति महत्वपूर्ण समुद्रीय प्रजातियों ने स्वयं को मैंग्रोव वनों के वातावरण के इतना अनुकूल बना लिया है कि मैंग्रोव वनों के बिना उन प्रजातियों की कल्पना ही नहीं की जा सकती

यह पुस्तक हमें श्री राजेंद्र जांगिड ने भेजी है
अवश्य पढ़ें ।

नोट: इस पुस्तक को नए सिरे से उपलब्ध करवा दिया गया हैअब इसे पढने में कोई मुश्किल नहीं आएगी
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राष्ट्र-कवि रामधारी सिंह दिनकर का कविता संग्रह - इतिहास के आंसू


आज किताबघर में प्रस्तुत है -
राष्ट्र-कवि रामधारी सिंह दिनकर का कविता संग्रह - 'इतिहास के आंसू'

यह उनकी ऐतिहासिक कविताओं का संकलन है । इसमें उनकी लगभग सभी ऐतिहासिक कवितायेँ संकलित है।


रामधारी सिंह दिनकर स्वतंत्रता पूर्व के विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से जाने जाते रहे। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रांति की पुकार है, तो दूसरी ओर कोमल श्रृँगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें कुरूक्षेत्र और उवर्शी में मिलता है।

ऊर्वशी को छोड़कर, दिनकरजी की अधिकतर रचनाएं वीर रस से ओतप्रोत है। उनकी महान रचनाओं में रश्मिरथी और परशुराम की प्रतीक्षा शामिल है. भूषण के बाद उन्हें वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है.

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि दिनकरजी गैर-हिंदीभाषियों के बीच हिंदी के सभी कवियों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय थे. उन्होंने कहा कि दिनकरजी अपनी मातृभाषा से प्रेम करने वालों के प्रतीक थे. हरिवंश राय बच्चन ने कहा कि दिनकरजी को एक नहीं, चार ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि उन्हें गद्य, पद्य, भाषा और हिंदी भाषा की सेवा के लिए अलग-अगल ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाना चाहिए.

दो न्याय अगर तो आधा दो, और, उसमें भी यदि बाधा हो,

तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम।

हम वहीं खुशी से खायेंगे,

परिजन पर असि न उठायेंगे!

लेकिन दुर्योधन

दुर्योधन वह भी दे न सका, आशीष समाज की ले न सका,

उलटे, हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य, साधने चला।

हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया,

डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले-

'जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,

हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है,

मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल।

सब जन्म मुझी से पाते हैं,

फिर लौट मुझी में आते हैं।

यह देख जगत का आदि-अन्त, यह देख, महाभारत का रण,

मृतकों से पटी हुई भू है,

पहचान, कहाँ इसमें तू है।




पृष्ठ संख्या: 90
आकार: 3.5 Mb




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यशपाल जी की कहानी - धर्म-युद्ध

किताबघर पर प्रस्तुत है - महान साहित्यकार यशपाल जी की कहानी - धर्म-युद्ध

यद्यपि धर्म और युद्ध दो अलग-अलग चीजे है । परन्तु कभी युद्ध के लिए धर्म अपनाना पड़ता है और कभी धर्म के लिए युद्ध करना पड़ता है।

फाइल का आकार: 1.7 Mb




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सोमवार, 8 मार्च 2010

सांप - विज्ञान साहित्य


विज्ञान साहित्य की कड़ी में हमारी अगली प्रस्तुति है-सांप

सांप एक ऐसा जीव है जिसके बारे मैं बहुत सारी भ्रांतियां प्रचलित है । इस पुस्तक को पढ़ कर आपको सांपो के बारे में बहुत कुछ जानने को मिलेगा।

इस पुस्तक को हमें श्री राजेंद्र जांगिड ने भेजा है जिसके लिए उनका बहुत-बहुत धन्यवाद्


नोट: इस पुस्तक को नए सिरे से उपलब्ध करवा दिया गया हैअब इसे पढने में कोई मुश्किल नहीं आएगी

पृष्ठ संख्या-110
फाइल
का आकार: 3 Mb




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रेगिस्तान - विज्ञान साहित्य


किताबघर में आज पेश है - विज्ञान आधारित पुस्तक - रेगिस्तान ।

इस पुस्तक में रेगिस्तान के बारे में रोचक जानकारी सरल भाषा में दी गए है जैसे रेगिस्तान क्या है, ये कैसे बने , संसार के विभिन्न रेगिस्तान कौन से है इत्यादि ।

इधर प्राकृतिक आपदाओं की संख्या और तीव्रता में बढ़ोतरी हुई है। मौसमी परिवर्तन का एक और बड़ा संकेतक, जिस पर हम पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहे हैं, बहुत तेजी से उभार पर है। वह है रेगिस्तानी इलाकों का विस्तार। दुनिया के लगभग सारे रेगिस्तानी क्षेत्र में विस्तार हो रहा है, लेकिन थार रेगिस्तान का विस्तार कुछ अधिक तेज गति से हो रहा है। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन यानी इसरो की हालिया रिसर्च बताती है कि थार अब केवल राजस्थान की पहचान नहीं है। इसने हरियाणा, पंजाब, गुजरात और मध्यप्रदेश तक अपने पांव फैला लिये हैं।


यह पुस्तक हमें श्री राजेंद्र जांगिड ने भेजी हैइसके लिए उनका धन्यवाद

बहुत रोचक पुस्तक है।

अवश्य पढ़ें।

नोट: इस पुस्तक को नए सिरे से उपलब्ध करवा दिया गया हैअब इसे पढने में कोई मुश्किल नहीं आएगी


पृष्ठ संख्या - 150
आकार: 5 Mb




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रविवार, 7 मार्च 2010

मिर्ज़ा ग़ालिब


है और भी दुनिया में सुखनवर बोहोत अच्छे ,
कहते है कि ग़ालिब का है अंदाज़-ऐ-ब्याँ और।


मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू अदब के बेहतरीन शायर रहे है। प्रस्तुत पुस्तक में केवल ग़ालिब के शेर दिए गए है बल्कि उनके जीवन के बारे में भी बताया गया है। उनके जीवन की प्रमुख घटनाएं भी इसमें दी गयी है और यह भी बताया गया है कि कौनसा शेर उन्होंने किस घटना पर लिखा।

बहुत ही रोचक पुस्तक है। अवश्य पढ़ें।




फाइल का आकार: 2 Mb




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शुक्रवार, 5 मार्च 2010

फांसी - उपन्यास (यशपाल)


आज किताबघर में पेश है - यशपाल जी का उपन्यास - फांसी

यशपाल (३ दिसंबर १९०३ - २६ दिसंबर १९७६) का नाम आधुनिक हिन्दी साहित्य के कथाकारों में प्रमुख है। ये एक साथ ही क्रांतिकारी एवं लेखक दोनों रूपों में जाने जाते है। प्रेमचंद के बाद हिन्दी के सुप्रसिद्ध प्रगतिशील कथाकारों में इनका नाम लिया जाता है।

अपने विद्यार्थी जीवन से ही यशपाल क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़े, इसके परिणामस्वरुप लम्बी फरारी और जेल में व्यतीत करना पड़ा । इसके बाद इन्होने साहित्य को अपना जीवन बनाया, जो काम कभी इन्होने बंदूक के माध्यम से किया था, अब वही काम इन्होने बुलेटिन के माध्यम से जनजागरण का काम शुरु किया। यश पाल को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन १९७० में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।


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गुरुवार, 4 मार्च 2010

श्री महेंद्र भटनागर का कविता संग्रह - आहत युग

किताबघर के पाठकों के लिए प्रस्तुत है - श्री महेंद्र भटनागर का कविता संग्रह - आहत युग

श्री महेंद्र भटनागर हमारे नियमित पाठक और जाने-माने कवि है। इनकी अब तक बहुत सी पुस्तकें विभिन्न भाषाओ में प्रकाशित हो चुकी है।


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गुलेरी जी की अमर कहानियां - कहानी संग्रह (चन्द्रधर शर्मा गुलेरी)



आज किताबघर में पेश है -
प्रसिद्ध
कहानीकार चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की सभी कहानियों का संग्रह - गुलेरी जी की अमर कहानियां


चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ऐसे अकेले कथा लेखक थे जिन्होंने मात्र तीन कहानियां लिखकर कथा साहित्य को नई दिशा और आयाम प्रदान किये


गुलेरी की साहित्यिक सक्रियता की अवधि कम है। उनका जन्म 1883 ई। में हुआ और 1922 ई. में उनका निधन हो गया। उन्होंने कुल तीन ही कहानियां लिखीं। पहली सुखमय जीवन 1911 ई. में भारत मित्र में छपी। दूसरी उसने कहा था, जो उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण और हिंदी साहित्य की अब तक की श्रेष्ठ कहानी मानी जाती है, 1915 ई. में छपी। उनकी तीसरी कहानी बुद्धू का कांटा है। यह हिंदी कहानी के विकास का आरंभिक समय था। प्रेमचंद इस समय सक्रिय थे, लेकिन उन्होंने अपनी श्रेष्ठ यथार्थदर्शी कहानियां बाद में लिखीं।



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बुधवार, 3 मार्च 2010

शिव-स्वरोदय शास्त्र


'अपनी हिंदी' के पाठकों के लिए पेश है -शिव स्वरोदय शास्त्र

यह कोई धार्मिक या ज्योतिष-सम्बन्धी पुस्तक नहीं हैयह एक विज्ञान है

आईने में क्या कभी आपने अपनी नाक को ध्यान से देखा है? अगर हाँ, तो बताइए हमारे जीवन में नाक की क्या उपयोगिता है? इस प्रश्न का उत्तर देने के बाद ही आगे पढ़ें। यदि आपका उत्तर भी यही है कि नाक हमारी प्रमुख ज्ञानेन्द्रिय है, इसके द्वारा हम गंध की पहचान एवं आवश्यक प्राणवायु ग्रहण करते हैं, तो आज तक आप भी एक महत्वपूर्ण एवं लाभदायक विज्ञान से अनभिज्ञ हैं

इसके विपरीत यदि आपके उत्तर में स्वर-विज्ञान या स्वरोदय विज्ञान का भी उल्लेख है, तो निश्चित ही आप भाग्यवान हैं एवं ईश्वर के कृपापात्र हैं, क्योंकि स्वर विज्ञान को जानने वाला कभी भी विपरीत परिस्थितियों में नहीं फँसता और फँस भी जाए तो आसानी से विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाकर बाहर निकल जाता है।

स्वर विज्ञान एक बहुत ही आसान विद्या है। इस विद्या को प्रसिद्ध स्वर साधक योगीराज यशपालजी ने 'विज्ञान' कहकर सुशोभित किया है। इनके अनुसार स्वरोदय, नाक के छिद्र से ग्रहण किया जाने वाला श्वास है, जो वायु के रूप में होता है। श्वास ही जीव का प्राण है और इसी श्वास को स्वर कहा जाता है

स्वर के चलने की क्रिया को उदय होना मानकर स्वरोदय कहा गया है तथा विज्ञान, जिसमें कुछ विधियाँ बताई गई हों और विषय के रहस्य को समझने का प्रयास हो, उसे विज्ञान कहा जाता है। स्वरोदय विज्ञान एक आसान प्रणाली है, जिसे प्रत्येक श्वास लेने वाला जीव प्रयोग में ला सकता है।

स्वरोदय अपने आप में पूर्ण विज्ञान है। इसके ज्ञान मात्र से ही व्यक्ति अनेक लाभों से लाभान्वित होने लगता है। इसका लाभ प्राप्त करने के लिए आपको कोई कठिन गणित, साधना, यंत्र-जाप, उपवास या कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं होती है। आपको केवल श्वास की गति एवं दिशा की स्थिति ज्ञात करने का अभ्यास मात्र करना है।

यह विद्या इतनी सरल है कि अगर थोड़ी लगन एवं आस्था से इसका अध्ययन या अभ्यास किया जाए तो जीवनपर्यन्त इसके असंख्य लाभों से अभिभूत हुआ जा सकता है।



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जुलूस - कहानी (प्रेमचंद)

'अपनी हिंदी' के पाठकों के लिए पेश है - उपन्यास-सम्राट प्रेमचंद की कहानी - जुलूस ।

ये प्रेमचंद जी की प्रसिद्ध कहानी है ।

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आहुति - कहानी संग्रह (इलाचंद्र जोशी)




'अपनी हिंदी' के पाठकों के लिए पेश है - प्रसिद्ध कहानीकार इलाचंद्र जोशी का कहानी संग्रह - आहुति


हिंदी कथा साहित्य में मुंशी प्रेमचंद के बाद की पीढ़ी में जैनेंद्र और अज्ञेय के साथ इलाचंद्र जोशी का कथा साहित्य विषय वस्तु और कलात्मक ऊंचाई में हमारा ध्यान सबसे अधिक खींचता है। बारह उपन्यास, आठ कहानी संग्रह, आठ समालोचना तथा निबंध संग्रह, एक कविता संग्रह सहित विविध विषयों पर छह अन्य मूल्यवान कृतियां जोशी जी ने हिंदी साहित्य को प्रदान की है।

इलाचंद्र जोशी का जन्म 13 दिसंबर 1902 को अल्मोड़ा में हुआ था। मात्र बारह वर्ष की आयु में उनकी पहली कहानी 'सहजनवां' शीर्षक से 'गल्पमाला' में छपी थी। जब वे सातवीं कक्षा के छात्र थे तब उन्होंने अपने बड़े भाई के निजी पुस्तकालय की समस्त किताबें पढ़ डाली थीं। दो वर्ष के भीतर ही इलाचंद्र ने हिंदी, अंग्रेजी तथा बांग्ला साहित्य का इतना अधिक अध्ययन कर लिया था कि कोई अन्य व्यक्ति लगभग बीस वर्ष में कर पाता।

मनोविश्लेषवादी उपन्यास और कहानी लेखन की दृष्टि से उनका स्थान शीर्ष पर है। उनके उपन्यासों में घृणामयी, संन्यासी, पर्दे की रानी, प्रेत और छाया, निर्वासित, मुक्तिपथ, सुबह के भूले, जहाज का पंछी, ऋतुचक्र, भूत का भविष्य और कवि की प्रेयसी सहित उनके कहानी संग्रह भी अत्यंत लोकप्रिय हुए



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मंगलवार, 2 मार्च 2010

श्री ब्रह्मसंहिता



किताबघर के पाठकों के लिए आज प्रस्तुत है - श्री ब्रह्मसंहिता

ब्रह्मसंहिता का भारतीय समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसलिए आप सभी के लिए इसे प्रस्तुत कर रहे है ।

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कनुप्रिया (संपूर्ण) - महाकाव्य (धरमवीर भारती)


आज किताबघर में पेश है : धरमवीर भारती की अमर कृति - कनुप्रिया । ये अपने आप में एक संपूर्ण पुस्तक है। इस पुस्तक का अंश किताबघर पर पहले ही प्रकाशित किया जा चूका है ।



लेखक के पिछले दृश्यकाव्य में एक बिन्दु से इस समस्या पर दृष्टिपात किया जा चुका है-गान्धारी, युयुत्सु और अश्वत्थामा के माध्यम से। कनुप्रिया उनसे सर्वथा पृथक-बिलकुल दूसरे बिन्दु से चल कर उसी समस्या तक पहुँचती है, उसी प्रक्रिया को दूसरे भावस्तर से देखती है और अपने अनजान में एक झलक एक झलक एक ४ करती है जो पूरक सिद्ध होते हैं। पर यह सब उस के अनजान में में होता है क्योंकि उस की मूलवृत्ति संशय या जिज्ञासा नहीं, भावाकुल तन्मयता है।
कनुप्रिया की सारी प्रतिक्रियाएँ उसी तन्मयता की विभिन्न स्थितियाँ हैं।


एक झलक:
ओ पथ के किनारे खड़े छायादार पावन अशोक-वृक्ष
तुम यह क्यों कहते हो कि तुम मेरे चरणों के स्पर्श की प्रतीक्षा में
जन्मों से पुष्पहीन खड़े थे तुम को क्या मालूम कि
मैं कितनी बार केवल तुम्हारे लिए-धूल में मिली हूँ
धरती में गहरे उतर जड़ों के सहारे
तु्म्हारे कठोर तने के रेशों में कलियाँ बन, कोंपल बन,सौरभ बन,लाली बन-
चुपके से सो गयी हूँ

कि कब मधुमास आये और तुम कब मेरे
प्रस्फुटन से छा जाओ !





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प्राणों की रक्षा हेतु मंत्र

अगर आप के घर में कोई गंभीर बीमार हो, डाक्टरों की दवाइयां भी काम कर रही हो तो ऐसे व्यक्ति के प्राणों की रक्षा इस मंत्र से की जा सकती है


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