वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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बुधवार, 27 जनवरी 2010

कहानी कुञ्ज - कहानी संग्रह


कहानी कुञ्ज - कहानी संग्रह में विभिन्न प्रसिद्ध लेखकों की ८ प्रसिद्ध कहानियां दी गयी है। सभी कहानियां पढने में रोचक और मनोरंजक है। अवश्य पढ़ें ।


आकार: 9 MB


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मंगलवार, 26 जनवरी 2010

नाक-कान-गला रोग - कारण और उपचार


इस पुस्तक में नाक-कान और गले के रोग उतप्पन होने के कारणों और उनके उपचार पर प्रकाश डाला गया है। अवश्य पढ़ें।

आकार: MB

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सोमवार, 25 जनवरी 2010

जल द्वारा चिकित्सा

जल मनुष्य के लिए अमृत के समान है। अगर उचित विधि से प्रयोग किया जाए तो ये बहुत से रोगों को भी दूर करता है। जल के इन्ही रोगनाशक गुणों के बारे में प्रस्तुत है - जल द्वारा चिकित्सा

इस पुस्तक में जल के द्वारा बहुत से असाध्य रोगों का उपचार करने की विधि लिखी है। भाप स्नान, कटी स्नान आदि के बारे में भी विस्तार से बताया गया है। हर मनुष्य को ये पुस्तक पढनी चाहिए । अवश्य पढ़ें।

आकार: १० MB

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रविवार, 24 जनवरी 2010

माटी की मूरतें - संस्मरण (रामवृक्ष बेनीपुरी)


रामवृक्ष बेनीपुरी हिंदी साहित्य के जाने-माने लेखक रहे है। इनका साहित्य बहुत ही उत्तम स्तर का है। इनकी रचनायें आज अत्यंत दुर्लभ है और आसानी से नहीं मिलती ।
किताबघर के पाठकों के लिए प्रस्तुत है इन्ही की एक रचना - माटी की मूरते । ये उनके द्वारा लिखे हुए संस्मरणों का संग्रह है।

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शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

अध्यापक जीवन की कहानियां - कहानी संग्रह


इस कहानी संग्रह में अध्यापक जीवन से सम्बंधित कहानियां दी गयी है। स्कूल, बच्चे, अध्यापक इन कहानियों के मुख्य पात्र है। ये अपनी तरह का एक अलग ही प्रयास है। सभी कहानियां अलग-अलग लेखकों द्वारा लिखी गयी है । आशा है, आपको ये कहानी-संग्रह पसंद आएगा।

आकार: १० MB

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गुरुवार, 21 जनवरी 2010

आरोग्य की कुंजी - महात्मा गाँधी


प्रस्तुत पुस्तक में महात्मा गाँधी ने सदा स्वस्थ रहने के उपाय लिखे है । महात्मा गाँधी प्राक्रतिक चिकित्सा में विश्वास रखते थे । केवल खान-पान और रहन-सहन के द्वारा बहुत से असाध्य रोगों को ठीक किया जा सकता है . ऐसा ही कुछ इस पुस्तक में बताया गया है . इस दुर्लभ पुस्तक को अवश्य पढ़ें।

आकार: MB


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बुधवार, 20 जनवरी 2010

चीड़ों पर चांदनी - यात्रा-वृतांत (निर्मल वर्मा )



निर्मल वर्मा (३ अप्रैल १९२९- २५ अक्तूबर २००५) हिन्दी के आधुनिक कथाकारों में एक मूर्धन्य कथाकार और पत्रकार थे। शिमला में जन्मे निर्मल वर्मा को मूर्तिदेवी पुरस्कार (१९९५), साहित्य अकादमी पुरस्कार (१९८५) उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। परिंदे (१९५८) से प्रसिद्धि पाने वाले निर्मल वर्मा की कहानियां अभिव्यक्ति और शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ समझी जाती हैं।

ब्रिटिश भारत सरकार के रक्षा विभाग में एक उच्च पदाधिकारी श्री नंद कुमार वर्मा के घर जन्म लेने वाले आठ भाई बहनों में से पांचवें निर्मल वर्मा की संवेदनात्मक बुनावट पर हिमांचल की पहाड़ी छायाएं दूर तक पहचानी जा सकती हैं। हिन्दी कहानी में आधुनिक-बोध लाने वाले कहानीकारों में निर्मल वर्मा का अग्रणी स्थान है। उन्होंने कम लिखा है परंतु जितना लिखा है उतने से ही वे बहुत ख्याति पाने में सफल हुए हैं। उन्होंने कहानी की प्रचलित कला में तो संशोधन किया ही, प्रत्यक्ष यथार्थ को भेदकर उसके भीतर पहुंचने का भी प्रयत्न किया है।

हिन्दी के महान साहित्यकारों में से अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसे कुछ ही साहित्यकार ऐसे रहे हैं जिन्होंने अपने प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर भारतीय और पश्चिम की संस्कृतियों के अंतर्द्वन्द्व पर गहनता एवं व्यापकता से विचार किया है।

चीड़ों पर चांदनी उनका मशहूर यात्रा-वृतांत है। इस पुस्तक में उन्होंने अपने दुनिया के सफ़र का रोचक वर्णन प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक से लेखक के जीवन के बारे में भी जानकारी मिलती है।



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मंगलवार, 19 जनवरी 2010

एक ही सुख निरोगी काया



प्रिय पाठकों,
आप सभी की मांग पर कुछ चिकित्सा सम्बन्धी पुस्तकें भी प्रकाशित की जा रही है जिनमे से पहली है - एक ही सुख निरोगी काया ।

इस पुस्तक में मनुष्य को सदा स्वस्थ रहने के उपाय बताएं गए है।

अवश्य पढ़ें।


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सोमवार, 18 जनवरी 2010

आखिर क्यूँ - कहानी संग्रह (विष्णु प्रभाकर)



विष्णु प्रभाकर ( २१ जून १९१२- ११ अप्रैल २००९) हिन्दी के सुप्रसिद्ध लेखक के रूप में विख्यात हुए। उनका जन्म उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के गांव मीरापुर में हुआ था। उनके पिता दुर्गा प्रसाद धार्मिक विचारों वाले व्यक्ति थे और उनकी माता महादेवी पढ़ी-लिखी महिला थीं जिन्होंने अपने समय में पर्दा प्रथा का विरोध किया था। उनकी पत्नी का नाम सुशीला था। विष्णु प्रभाकर की आरंभिक शिक्षा मीरापुर में हुई। बाद में वे अपने मामा के घर हिसार चले गये जो तब पंजाब प्रांत का हिस्सा था। घर की माली हालत ठीक नहीं होने के चलते वे आगे की पढ़ाई ठीक से नहीं कर पाए और गृहस्थी चलाने के लिए उन्हें सरकारी नौकरी करनी पड़ी। चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी के तौर पर काम करते समय उन्हें प्रतिमाह १८ रुपये मिलते थे, लेकिन मेधावी और लगनशील विष्णु ने पढाई जारी रखी और हिन्दी में प्रभाकर व हिन्दी भूषण की उपाधि के साथ ही संस्कृत में प्रज्ञा और अंग्रेजी में बी।ए की डिग्री प्राप्त की।

विष्णु प्रभाकर पर महात्मा गाँधी के दर्शन और सिद्धांतों का गहरा असर पड़ा। इसके चलते ही उनका रुझान कांग्रेस की तरफ हुआ और स्वतंत्रता संग्राम के महासमर में उन्होंने अपनी लेखनी का भी एक उद्देश्य बना लिया, जो आजादी के लिए सतत संघर्षरत रही। अपने दौर के लेखकों में वे प्रेमचंद, यशपाल, जैनेंद्र और अज्ञेय जैसे महारथियों के सहयात्री रहे, लेकिन रचना के क्षेत्र में उनकी एक अलग पहचान रही।

विष्णु प्रभाकर ने पहला नाटक लिखा- हत्या के बाद, हिसार में नाटक मंडली में भी काम किया और बाद के दिनों में लेखन को ही अपनी जीविका बना लिया। आजादी के बाद वे नई दिल्ली आ गये और सितम्बर १९५५ में आकाशवाणी में नाट्य निर्देशक के तौर पर नियुक्त हो गये जहाँ उन्होंने १९५७ तक काम किया। वर्ष २००५ में वे तब सुर्खियों में आए जब राष्ट्रपति भवन में कथित दुर्व्यवाहर के विरोध स्वरूप उन्होंने पद्म भूषण की उपाधि लौटाने की घोषणा की। उनका आरंभिक नाम विष्णु दयाल था। एक संपादक ने उन्हें प्रभाकर का उपनाम रखने की सलाह दी। विष्णु प्रभाकर ने अपनी लेखनी से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया.उन्होंने साहित्य की सभी विधाओं में अपनी लेखनी चलाई।

१९३१ में हिन्दी मिलाप में पहली कहानी दीवाली के दिन छपने के साथ ही उनके लेखन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज आठ दशकों तक निरंतर सक्रिय है। नाथूराम शर्मा प्रेम के कहने से वे शरत चन्द्र की जीवनी आवारा मसीहा लिखने के लिए प्रेरित हुए जिसके लिए वे शरत को जानने के लगभग सभी सभी स्रोतों, जगहों तक गए, बांग्ला भी सीखी और जब यह जीवनी छपी तो साहित्य में विष्णु जी की धूम मच गयी। कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, बाल साहित्य सभी विधाओं में प्रचुर साहित्य लिखने के बावजूद आवारा मसीहा उनकी पहचान का पर्याय बन गयी। बाद में अ‌र्द्धनारीश्वर पर उन्हें बेशक साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला हो, किन्तु आवारा मसीहा ने साहित्य में उनका मुकाम अलग ही रखा।

विष्णु प्रभाकर ने अपनी वसीयत में अपने संपूर्ण अंगदान करने की इच्छा व्यक्त की थी। इसीलिए उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया, बल्कि उनके पार्थिव शरीर को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को सौंप दिया गया। वे सीने और मूत्र में संक्रमण तथा न्युमोनिया के कारण २३ मार्च २००९ से महाराजा अग्रसेन अस्पताल में भर्ती थे। उन्होंने २० मार्च से खाना-पीना छोड़ दिया था। उनके परिवार में दो बेटे और दो बेटियाँ हैं।


आखिर क्यूँ - विष्णु प्रभाकर का कहानी संग्रह है जिसमे कुल १५ कहानियां दी गयी है। सभी कहानियां मनोरंजक है।



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रविवार, 17 जनवरी 2010

आँखों देखी कहानियां - कहानी संग्रह (श्री रामनरेश त्रिपाठी)

प्रिय पाठकों,

किताबघर में इस बार प्रस्तुत है- आँखों देखी कहानियां

इस पुस्तक में सत्य घटनाओं पर आधारित कुल ११ कहानियां दी गयी है। सभी कहानियां मनोरंजक है। अवश्य पढ़ें।

फाइल का आकार: 6 MB

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शनिवार, 16 जनवरी 2010

पिंजर- उपन्यास (अमृता प्रीतम)




मशहूर लेखिका और कवियत्री अमृता प्रीतम का जन्म 1919 में वर्तमान पाकिस्तान के गुजरांवाला में हुआ। विभाजन की त्रासदी ने इनके दिल पर अमिट छाप छोड़ी। जो इनकी रचनाओं में भी झलकता है. इन्होने पिंजर जैसे चर्चित उपन्यास की रचना की जिस पर फिल्म भी बनी। 2005 में नयी दिल्ली में इनका देहांत हो गया।

पिंजर कहानी है एक हिन्दू लड़की पूरो की, जिसे एक मुस्लिम युवक अपने अपमान का बदला लेने के लिए अगवा कर लेता है और वो भी पूरो की शादी से ठीक पहले। फिर क्या हुआ?

फाइल का आकार: 10 MB

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शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

आखरी चट्टान तक - यात्रा-वृतांत (मोहन राकेश)

प्रिय पाठकों,
आज आप सभी के लिए पेश है मोहन राकेश का यात्रा-वृतांत -आखरी चट्टान तक

मोहन राकेश (1925-1972) को कौन नहीं जानता उनका नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है आप हिंदी साहित्य के जाने -माने कहानीकार, नाटककार और उपन्यासकार रहे है

इस पुस्तक में मोहन राकेश ने अपने भारत-भ्रमण के अनुभवों का वर्णन किया है। मोहन राकेश की कलम का जादू तो आप जानते ही है। उस समय के समाज, प्राकृतिक सौन्दर्य इत्यादि का इतना सजीव वर्णन किया है कि इसे पढ़कर आपका भी मन यात्रा करने को करने लगेगा।



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गुरुवार, 14 जनवरी 2010

ब्लैक-होल ---- उपन्यास (हिंदी में अनुवादित)


ब्लैक-होल हिंदी में अनुवादित उपन्यास है।
इसे श्री प्रशांत सिंह ने हमारे पास भेजा है। इसके बारे में उन्होंने ज्यादा जानकारी नहीं दी है। मगर पुस्तक काफी रोचक है। ये रहस्यमयी घटनाओं से भरी हुई है।

प्रशांत जी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद्। कृपया अगली बार पुस्तक और अपने बारे में और जानकारी भी भेजिए.

विशेष सुचना:
इस पुस्तक का अनुवाद करने में किसी सॉफ्टवेर का प्रयोग किया गया है जिसकी वजह से दो अक्षरों के बीच में Space सही नहीं आ पाया है। जैसे कि:

" राम जा रहा है । "
को ऐसे लिखा गया है
"रा मजा रहा है । "

इससे आपको ये पुस्तक पढने में सामान्य से थोडा ज्यादा समय लगेगा।
फिर भी पुस्तक पढने लायक है। अवश्य पढ़ें।


फाइल का आकार: 1 MB

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बुधवार, 13 जनवरी 2010

मृत्यु बोध - जीवन-बोध --- कविता संग्रह (डॉ महेंद्र भटनागर)


किताबघर में इस बार पेश है प्रसिद्ध कवि डॉ महेंद्र भटनागर का कविता संग्रह - मृत्यु बोध - जीवन-बोध

इसे ख़ुद डॉ महेंद्र भटनागर ने हमें भेजा है।इसके लिए उनको धन्यवाद्। इसमे कुल 50 कवितायेँ दी गई है। आशा है आपको पसंद आएगी।

डॉ महेंद्र भटनागर के बारे में और अधिक जानकारी पाने के लिए देखें:

www.professormahendrabhatnagar.blogspot.com
www.kavitakosh.org/mbhatnagar.htm
www.blogbud.com/drmahendrabhatnagar
www.poetrypoem.com/mpb1



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मंगलवार, 12 जनवरी 2010

कर्मभूमि - उपन्यास (प्रेमचंद)


किताबघर में आज पेश है प्रेमचंद का महान उपन्यास - कर्मभूमि

कर्मभूमि उपन्यास एक राजनीतिक उपन्यास है जिसमें विभिन्न राजनीतिक समस्याओं को कुछ परिवारों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। ये परिवार यद्यपि अपनी पारिवारिक समस्याओं से जूझ रहे हैं तथापि तत्कालीन राजनीतिक आन्दोलन में भाग ले रहे हैं। उपन्यास का कथानक काशी और उसके आस-पास के गाँवों से संबंधित है। आन्दोलन दोनों ही जगह होता है और दोनों का उद्देश्य क्रान्ति है। किन्तु यह क्रान्ति गाँधी जी के सत्याग्रह से प्रभावित है। गाँधीजी का कहना था कि जेलों को इतना भर देना चाहिए कि उनमें जगह न रहे और इस प्रकार शक्ति और अहिंसा से अंग्रेज सरकार पराजित हो जाए।
ये उपन्यास भी हमें श्री अजीत प्रताप सिंह ने भेजा हैअजीत जी, आपका बहुत बहुत धन्यवाद्

उपन्यास के कुछ अंश:

हमारे स्कूलों कालेजों में जिस तत्परता से फ़ीस वसूल की जाती है, शायद मालगज़ारी भी उतनी सख़्ती से नहीं वसूल की जाती। महीने में एक दिन नियत कर दिया जाता है। उस दिन फ़ीस का दाख़िला होना अनिवार्य है। या तो फ़ीस दीजिए, या नाम कटवाइए, या ज़ब तक फ़ीस न दाख़िल हो, रोज़ कुछ ज़ुर्माना दीजिए। कहीं-कहीं ऐसा भी नियम है कि उसी दिन फ़ीस दोगुनी कर दी जाती है, और किसी दूसरी तारीख़ को दुगुनी फ़ीस न दी तो नाम कट जाता है। काशी के क्वींस कालेज में यही नियम था। सातवीं तारीख़ को फ़ीस न दो, तो इक्कीसवीं तारीख़ को दुगुनी फ़ीस देनी पड़ती थी, या नाम कट जाता था। ऐसे कठोर नियमों का उद्देश्य इसके सिवा और क्या हो सकता था, कि ग़रीब के लड़के स्कूल छोड़कर भाग जायँ। वही हृदयहीन दफ्तरी शासन, जो अन्य विभागों में है, हमारे शिक्षालयों में भी है। वह किसी के साथ रिआयत नहीं करता।

चाहे जहाँ से लाओ, कर्ज़ लो, गहने गिरवी रखो, लोटा-थाली बेचो, चोरी करो, मगर फ़ीस ज़रूर दो, नहीं तो दूनी फ़ीस देनी पड़ेगी, या नाम कट जाएगा। ज़मीन और जायदाद के कर वसूल करने में भी कुछ रियायत की जाती है। हमारे शिक्षालयों में नमीं को घुसने नहीं दिया जाता। वहाँ स्थायी रूप से मार्शल-लॉ का व्यवहार होता है। कचहरी में पैसे का राज, हमारे स्कूलों में भी पैसे का राज है, उससे कहीं कठोर, कहीं निर्दय। देर में आइए तो जुर्माना; न आइए तो जुर्माना; सबक़ न याद हो तो जुर्माना; किताबें न खरीद सकिए तो जुर्माना; कोई अपराध हो तो जुर्माना; शिक्षालय क्या है, जुर्मानालय है। यही हमारी पश्चिम शिक्षा का आदर्श है, जिसकी तारीफ़ों के पुल बाँधे जाते हैं। यदि ऐसे शिक्षालयों से पैसे पर जान देने वाले, पैसे के लिए ग़रीबों का गला काटने वाले, पैसे के लिए अपनी आत्मा को बेच देने वाले छात्र निकलते हैं, तो आश्चर्य क्या है ?...........



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रविवार, 10 जनवरी 2010

निर्मला - उपन्यास (प्रेमचंद)


किताबघर में आज प्रस्तुत है - प्रेमचंद का प्रसिद्ध उपन्यास - निर्मला

प्रेमचन्द्र की गणना हिन्दी के निर्माताओं में की जाती है। कहानी और उपन्यास के क्षेत्रों में उन्होंने पहली सफल रचनाएँ दीं जो गुण तथा आकार दोनों दृष्टियों से अन्यतम हैं।
प्रेमचन्द्र के जिन उपन्यासों ने साहित्य के मानक स्थापित किए, उनमें निर्मला बहुत आगे माना जाता है। इसमें हिन्दू समाज में स्त्री के स्थान का सशक्त चित्रण किया गया है। इस पर बना दूरदर्शन का सीरियल भी बहुत लोकप्रिय हुआ है।

प्रेमचन्द का यह उपन्यास ‘‘निर्मला’’ छोटा होते हुए भी उनके प्रमुख उपन्यासों में गिना जाता है। इसका प्रकाशन आज से लगभग 65 साल पहले 1925 में हुआ था। इस उपन्यास में उन्होंने दहेज प्रथा तथा बेमेल विवाह की समस्या उठाई है और बहुसंख्यक मध्यमवर्गीय हिन्दू समाज के जीवन का बड़ा यथार्थवादी मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है।


ये उपन्यास हमें श्री अजीत प्रताप सिंह ने भेजा हैअजीत जी, आपका बहुत बहुत धन्यवाद्आशा है, आपका सहयोग हमें आगे भी मिलता रहेगा

फाइल का आकार : 4 MB

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शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

आसा का तमाशा (आसाराम बापू का कथित सच )

आसाराम बापू एक बार फिर विवादों में है। हो सकता है उन्हें जेल भी जाना पड़े। सभी आसाराम बापू के बारे में जानना चाहते है। इसीलिए किताबघर के पाठकों के लिए हम लेकर आये है एक ख़ास पेशकश - आशा का तमाशा ।

इसमें कथित तौर पर आसाराम बापू का पूरा इतिहास दिया गया है। ये लेख अगस्त २००८ में एक राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका में प्रकाशित हुआ था



नोट: 'अपनी हिंदी' का इस लेख से कोई सम्बन्ध नहीं है . ये लेख सिर्फ पाठकों को जानकारी प्रदान करने के लिए दिया गया है. पाठक  इसमें निहित सच-झूठ का अपने विवेक से खुद फैसला करें. 


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गुरुवार, 7 जनवरी 2010

स्वामी रामदेव से एक खास मुलाकात - हिंदी


किताबघर में इस बार पेश है - स्वामी रामदेव से एक खास मुलाकात। ये मुलाकात बीबीसी समाचार सेवा ने बाबा रामदेव से की थी। हमेशा की तरह बाबा रामदेव ने सभी सवालों के जवाब बेबाकी से दिए है।

फाइल का आकर: २५० KB



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मंगलवार, 5 जनवरी 2010

अदभुत कहानियां - कहानी संग्रह

अदभुत कहानियां पुस्तक में 29 सच्ची और अनूठी कहानियां दी गयी है। इसमें पशु-पक्षियों की समझदारी,स्वामिभक्ति और दयालुता के बारे में बताया गया है। जैसे किस तरह एक बन्दर ने अपने मालिक की जान बचाने के लिए अपने प्राण दे दिए। ये सभी कहानियां सच्ची है।

ये पुस्तक आपके बच्चो को भी बहुत पसंद आएगी। आप इसमें से कहानियां पढ़कर उन्हें सुना सकते है । इससे उनमे भी दया, करुणा और प्रेम की भावनाएं विकसित होगी और वे पशु-पक्षियों से और प्यार करना सीखेंगे। .

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