वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं। - आचार्य श्रीराम शर्मा
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रविवार, 19 जनवरी 2014

हाथी की फांसी - गणेशशंकर विद्यार्थी


गणेशशंकर विद्यार्थी एक निडर और निष्पक्ष पत्रकार तो थे ही, इसके साथ ही वे एक समाज-सेवी, स्वतंत्रता सेनानी और कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। भारत के 'स्वाधीनता संग्राम' में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा था। अपनी बेबाकी और अलग अंदाज से दूसरों के मुँह पर ताला लगाना एक बेहद मुश्किल काम होता है।

 कलम की ताकत हमेशा से ही तलवार से अधिक रही है और ऐसे कई पत्रकार हैं, जिन्होंने अपनी कलम से सत्ता तक की राह बदल दी। गणेशशंकर विद्यार्थी भी ऐसे ही पत्रकार थे, जिन्होंने अपनी कलम की ताकत से अंग्रेज़ी शासन की नींव हिला दी थी।
 गणेशशंकर विद्यार्थी एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जो कलम और वाणी के साथ-साथ महात्मा गांधी के अहिंसक समर्थकों और क्रांतिकारियों को समान रूप से देश की आज़ादी में सक्रिय सहयोग प्रदान करते रहे।

'हाथी की फांसी' इन्ही की एक मनोरंजक कहानी है। 

फाइल का आकार: 125 Kb

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हिंदी आलोचना: अतीत और वर्तमान



'हिंदी आलोचना: अतीत और वर्तमान" पुस्तक में हिंदी साहित्य की आलोचनात्मक पद्धति के २ युगों की तुलना की गयी है। यह पुस्तक हिंदी भाषा के अनुभवी साहित्यकार श्री प्रभाकर माचवे के व्याख्यानों पर आधारित है।

प्रभाकर माचवे का जन्म ग्वालियर में तथा शिक्षा इंदौर में और आगरा में हुई। इन्होंने एम.ए., पी-एच.डी. एवं साहित्य वाचस्पति की उपाधियां प्राप्त की।

हमें विश्वास है कि ये पुस्तक हिंदी भाषा के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगी वहीँ हिंदी के सुबुध पाठकों का भी ध्यान आकृष्ट अवश्य करेगी।


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मंगलवार, 26 नवंबर 2013

आचार्य विनोबा भावे


'भूदान आन्दोलन' के द्वारा भारतीय समाज की दशा और दिशा बदल देने वाले आचार्य विनोबा भावे के बारे में यह पुस्तक हमें बहुत सी जानकारियां देती है।

आचार्य विनोबा भावे
(11 सितेम्बर, 1895 - 15 नवंबर, 1982) के जन्म का नाम विनायक नरहरी भावे था। उनका जन्म गागोडे, महाराष्ट्र मे हुआ था। उन्हे भारत का राष्ट्रीय आध्यापक और महात्मा गांधी का आध्यातमिक उत्तराधीकारी समझा जाता है। उन्होने अपने जीवन के आखरी वर्ष पुनार, महाराष्ट्र के आश्रम मे गुजारे। इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल को अनुशासन पर्व कहने के कारण वे वि्वाद मे भी थे।

फाइल का आकार: 7 Mb


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गुरुवार, 21 नवंबर 2013

रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा




रामप्रसाद बिस्मिल भारत के महान सपूत थे जिन्होने भारत की आजादी के लिये अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनका जन्म सन १८९७ में उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में हुआ था। १९ दिसम्बर, सन १९२७ को ब्रिटिश शासन ने उनको गोरखपुर जेल में फांसी पर चढा दिया।

रामप्रसाद बिस्मिल ने यह आत्म-कथा अपनी फांसी से दो दिन पहले ही समाप्त की थी

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वन्दे मातरम् के बाद अमर शहीद रामप्रसाद 'बिस्मिल' का 'सरफरोशी की तमन्ना' ही वह गीत है जिसे गाते हुए कितने ही देशभक्त फांसी के फन्दे को चूम लिये।
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वन्दे मातरम् के बाद अमर शहीद रामप्रसाद 'बिस्मिल' का सरफरोशी की तमन्ना  ही वह गीत है जिसे गाते हुए कितने ही देशभक्त फांसी के फन्दे को चूम लिये।

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है
 

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है


करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है

रहबरे राहे मुहब्बत, रह न जाना राह में
लज्जते-सेहरा न वर्दी दूरिए-मंजिल में है

अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़
एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है ।

ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूचा-ए-कातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

है लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर,
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर,
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिन में हो जुनून कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से,
और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बाँधकर सर पे कफ़न,
जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम.
जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

यूँ खड़ा मकतल में कातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें कोई रोको ना आज
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून
तूफ़ानों से क्या लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है


- बिस्मिल आजिमाबादी

फाइल का आकार:
5 Mb


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मंगलवार, 19 नवंबर 2013

निशा निमंत्रण - हरिवंशराय बच्चन


निशा निमंत्रण हरिवंशराय बच्चन के गीतों का संकलन है जिसका प्रकाशन १९३८ ई० में हुआ। ये गीत १३-१३ पंक्तियों के हैं जो कि हिन्दी साहित्य की श्रेष्ठतम उपलब्धियों में से हें।

ये गीत शैली और गठन की दृष्टि से अतुलनीय है। नितान्त एकाकीपन की स्थिति में लिखी गईं ये त्रयोदशपदियाँ अनुभूति की दृष्टि से वैसी ही सघन हैं जैसी भाषा शिल्प की दृष्टि से परिष्कृत। संकलन के सभी गीत स्वतंत्र हैं फिर भी प्रत्येक की रचना का गठन एक मूल भाव से अनुशासित है। पहला गीत "दिन जल्दी जल्दी ढलता है" से प्रारम्भ होकर "निशा निमंत्रण" रात्रि की निस्तब्धता के बड़े सघन चित्र करता हुआ प्रातःकालीन प्रकअश में समाप्त होता है। प्रत्येक दृष्टि से निशा निमंत्रण के गीत उच्चकोटि के हैं और बच्चन का कवि अपने चरम पर पहुँच गया प्रतीत होता है।

फाइल का आकार: 3 Mb

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